लघुकथा

राखी की कीमत

सुबह मैं दफ्तर के लिये निकला तो मन में एक कशमकश चल रही थी। राखी का त्योहार है लेकिन सदैव की तरह आज भी मेरी कलाई सूनी थी। सच कहूँ तो बहन होनी बहुत जरुरी है। बिना बहन के घर भी कितना खाली लगता है। भगवान शायद किस्मत वालों को ही बहन का प्यार देता है। तभी कानों में आवाज पड़ी राखी ले लो राखी सुन्दर और सस्ती । नज़र घुमाई तो देखा एक नन्हीं सी गुड़िया मैली कुचैली स्कूल यूनीफार्म में फुटपाथ पर तीन चार राखी लेकर बैठी थी। मैं अपना रास्ता छोड़कर उसके पास चला गया और पूछा अरे मुन्नी आज तुम स्कूल नहीं गयीं और यहांँ क्यूँ बैठी हो ? आपको दिखाई नहीं देता मैं राखी बेच रही हूँ बचपन सुलभ उत्तर दिया उसने। अम्मा विमार है उसके लिये दवाई लेनी है”
क्या हुआ है अम्मा को मैंने पूछा। यह तो मुझे नहीं पता उसने कहा, लेकिन दो तीन दिन से लेटी रहती है हर वक्त काम पर भी नहीं जाती, मेरे स्कूल की फीस भी नहीं दी अभी तक। क्या करती है तुम्हारी अम्मा मैंने पूछा। लोगों के घरों में बर्तन, झाड़ू पोंछा करती है , उसने उत्तर दिया। घर में और कौन कौन है मैने जानना चाहा। और कोई नहीं है घर में हम माँ बेटी के सिवा, उसने कहा। मेरे दिल में एक गहरी टीस सी उठी और आँखों में आँसु छलक आये। अच्छा मुन्नी! यह बताओ मैं तुम्हारी सारी राखीयाँ खरीद लूँ तो मुझे दे दोगी ? हाँ, पर पैसे कम नहीं करुँगी। आठ साल की बच्ची के मुँह से एसी परिपक्व बातें सुन कर अच्छा लगा और हैरानी भी हुई। कितने पैसे हुए तीन राखियों के मैंने पूछा। तीन नहीं चार हैं वह बोली। लेकिन मुझे तीन ही लेनी हैं मैंने कहा। उसका चेहरा उदास हो गया और कहने लगी यह चौथी वाली किसे बेचूँगी । इसे बेचो मत मेरी कलाई पर बाँध दो मैंने कहा। अरे! तुम कोई मेरे भाई हो जो तुम्हें राखी बाँध दूँ । बना लो न मुझे अपना भाई मैने कहा। उसने कुछ सोचा और कहा ठीक है पर इस राखी के भी पैसे लूँगी । ठीक है मैंने कहा। फिर उसने मेरी कलाई पर चौथी राखी बाँध दी। मैंने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा और उसे सीने से लगा लिया। मैं जानता था राखी की कीमत मैं नहीं दे सकता था। मैंने उसका हाथ थामा और उसके घर की ओर बढ़ गया।

सुरेश भारद्वाज निराश
धर्मशाला हिप्र

राखी/सुरेश भारद्वाज निराश

कच्चे धागे का बन्धन/राजेश पुरोहित