ग़ज़ल
ये जिन्दगी कहां अब रास्ता दिखाती है
किये जो कर्म हैं हमने न भूल पाती है

ये मार डालेगा हमको तो दर्द सीने का
मिला जो दर्द है खुद को फटी क्यूँ छाती है

विरानी महफिलों हैं ये तेरे बिना साकी
भरे जो जाम न कोई तू क्यूं बुलाती है

नशे में डूबी ये दुनिया न बात अब माने
किसी का दर्द न जाने रहम न खाती है

हवा ने अब जो छेड़ा है ये राग उल्फत का
ये हाले यार भी आकर मुझे सुनाती है

कहीं किसी को कोई लूटे यार दुनिया में
किसी को लूटना ये दुनिया ही सिखाती है

भरी हैं आंखें ये मेरी जले वदन मेरा
न चैन पड़ता है मुझको न नींद आती है

सुरेश भारद्वाज निराश
धर्मशाला हिप्र