मेरा सफर*
सफर रास्तों का कुछ ऐसा रहा
तब तक चले जेब भर पैसा रहा
यह तो थी वाहनी सफर की बात
मत पूछो के पैदल का कैसा रहा

हौंसला था, उम्मीद व आशा थी
जेब ख़ाली थी मन निराशा रहा
पर दिल ना डोला कुछ ना बोला
बस, कदम को आगे बढ़ाता रहा

कुछ मेरे साथ रहे, कुछ छूट गए
कुछ अपने थे, भरी जेब लूट गए
कदम फिर भी नहीं रोके हैं मैंने
बेशक चलते हुए लड़खड़ाता रहा

अब तो रोज चलने की आदत है
कुछ दूरी पर मंजिल की आहट है
अब भी लोग खीँच रहे टांग मेरी
वो अपने हैं, तभी मन हताशा रहा
_________रविंद्र कुमार अत्री