?माँ??

लोरी, झूला और खिलौने,
सब में माँ समाई है।
मेरा हर एक अच्छा काम,
माँ की ही परछाई है।
मेरी चिन्ता और चिंतन सब,
माँ की आंखों में दिख जाता।
मेरे दुख में मुझसे ज्यादा,
माँ ने पीड़ा पाई है।
माँ के लिए तो केवल मैं ही,
सपना और हकीकत हूँ।
मेरा साथ ही रौनक माँ की,
वरना मेला भी तन्हाई है।
मुझको देख कर खिल जाती माँ,
नहीं दिखा मैं तभी तो माँ मुरझाई है।
बड़े नसीबों बाले हैं वे,
माँ जिनके हिस्से आई है।

गोपाल शर्मा,
21, जय मार्कीट,
काँगड़ा, हि.प्र.।
09816340603