दोस्तो एक कहानी–भीखू 13अप्रैल 2020 को लिखी गई थी आप सब की नज़्रभीखू“इक्कीस दिन तक सब बंद,भैयययया यह तो बहुत मुश्किल हो गयी, भीखू एक तरफ खडे रिक्शा जो उसकी नहीं थी उसके मालिक की थी ,सीट को साफ करता खुद से वार्तालाप में मग्न था।जोरू होती तो उससे मन की बात करता पर वो तो बिंदिया के जन्म के बाद दुनिया ही छोड़ गयी और अपने पीछे छोड़ गयी कल्लवा और विंदिया को जो अब दो बर्ष की हो चुकी थी, हे पालन हार जैसी तेरी इच्छा भगवन हिम्मत दे, भीखू भावुक अवश्य हुआ पर रोया नहीं गरीबी और भूख की आग में जलते जलते भीखू का तन मन जैसे फ़ौलाद बन चुका था।’बापू भूख लगी है ‘,चार साल के कल्लवा नें भीखू की सोच की झील में हलचल मचा दी ,वो तुरंत अंदर आया चूल्हे के पास कुछ चावल और आलू पड़े थे ,उसने झट से गीला भात और सूखे आलू की तरकारी बना कर दोनों बच्चों को गीला भात और तरकारी परोस दी ।खुद मुंह में निवाला डालने ही वाला था कि उसे एक दम से ख़याल आया कि माता रानी की तस्वीर के पीछे कुल इतने ही पैसे थे जिससे उस अकेले का तीन दिन और बच्चों का छः दिन पेट भर सकता था।बैंक वैलंस, एकाउंट यह सब तो अमीरों के चोंचले हैं, रोज़ कमा कर खाने वाला यह सब क्या जाने,अभी यह सब उसके ज़हन में चल रहा था कि उसके ख़यालों नें एक दम से पलटी मारी और कहने लगे, काश हम पर महामारी का संशय हो जाये सरकार को तो सेंटर में भर पेट खाना तो मिलेगा ।”थोड़ी भात और डाल न बापू”, भीखू अपने ध्यान से वापिस आया और अपनी थाली में से आधा भात कल्लवा को आधा बिंदिया को डाल दिया खुद पानी पीकर संतुष्ट हो गया ।आखिर माता रानी की तस्वीर के पीछे रखे पैसे भी समाप्त होने ही थे ।बिंदिया भूख से तडप रही थी, लगातार रो रही थी, “बापू बाज़ार कब जाओगे,बोलो न बापू कब जायोगे”,,,,।”अरे चुप” भीखू चिल्ला कर उसकी तरफ थोड़ा लपका,,,”ऊंऊं,ऊंऊऊऊ, कल्लवा सहमा, रोता हुआ बाहर चला गया ।भीखू नें दोनों हाथों से अपने चहरे को रगड़ा, और खुद को संभाला ।”ओ कल्लवा रो मत बाज़ार जा रहा हूँ” ,यह कह कर भीखू निकल पडा अन्न के जुगाड़ में ।वो सीधा अपने रिक्शा मालिक की घर की तरफ तेज कदमों से चल पडा इस उम्मीद में कि वहां से उसे मदद ज़रूर मिलेगी ।वो प्यास से व्याकुल हो चुका था, उसकी टांगों में बस इतनी ही ताकत बची थी कि जिससे वो बडी मुश्किल से खडा हो सकता था, पर उसे चलना था सबाल पापी पेट का था अपने से ज्यादा बच्चों के पेट का।ऐसे तैसे वो वहां पहुंचा, मालिक,मालिक आवाज़ लगाई पर अंदर से कोई भी जबाब नहीं आ रहा था ।भीखू नें दरवाज़ा पीटा, मालिक दरवाज़ा खोलने जा ही रहा था कि,”सुनो जी कहाँ जा रहे, हो क्यों दरवाज़ा खोलने लगे हो , पता है न महामारी फैली है, फिज़िकल डिस्टैंसिंग,बगैरा सब भूल गये ,”मालकिन तीखे स्वर में बोली ।भीखू समझ गया वो वापिस लौट गया मायूस, ढीले ढीले कदमों से सड़क नाप रहा था ,कि अचानक उसके पिछवाड़े में बहुत ज़ोर से किसी नें वार किया भीखू की आंखों के आगे अंधेरा छा गया चार दिनों से पेट भी तो खाली था अन्न का एक भी दाना तो अंदर गया नहीं था ।एक और वार हुआ इस बार भीखू बोल चिला उठा “हे राम”।”हे राम के बच्चे सड़क में घूम रहा है पी रखी है क्या ढीले कदमों से चला है कर्फ्यू का लिहाज़ है या नहीं “,? पुलिस कांस्टेबल लगा तार सबाल पे सबाल करे जा रहा था लाठी के दम पर।भीखू थोड़ा संभला” माई बाप बच्चे घर में भूखे हैं अन्न के जुगाड़ में बाहर निकला था” साहब, “मेरी मदद कीजिये “।पुलिस कांस्टेबल उसकी मनोदशा समझ गया और 100 रूपये का नोट उसे “यह लो तुम्हारे काम आएंगे “।भीखू नें चावल और कुछ सब्ज़ी ली और घर पहुँच गया ।उसकी आंखों के आगे फिर अंधेरा सा छागया पर उसने पानी पी कर खुद को संभाला और मन में विचार किया आज मैं भी थोड़ा बहुत खा लूंगा पांच दिन से पेट खाली है शायद तभी चक्कर आ रहा ।उसने चूल्हा जलाया, गीला भात और पपीते की सूखी तरकारी बनाई और दोनों बच्चों को परोस कर खुद के लिए भी थाली लगाई हाथ निवाले के लिए आगे बढ़ाया ही था कि फिर आंखों के आगे अंधेरा छा गया, इस बार उसे सुनना भी बंद हो गया वो कभी पेट पकडता कभी सर इस सब के दौरान बच्चे अपने खाने में मग्न थे ।अगले ही पल भीखू औंधे मुँह गिर पड़ा ।अब ज़िंदगी की सारी जद्दोजहद खत्म हो चुकी थी भीखू मोक्ष को प्राप्त हो चुका था ।”बापू, बापू यहाँ क्यों सो गये खटिया पर सोना था”,कल्लवा मुँह में भात के निवाले को चबाते हुए बोला ।”देख बिंदिया बापू यहाँ सो गया हीही हीही ही—।”मैं ओल भात लूँ गी” ,विंदियां अपने पीले पीले सारे दांतों को निकालते हुए खुशी में लबरेज़ होकर बोली,क्योंकि पेट आनंदित और शांत हो रहा था और समय मूक होकर बच्चों के ठहाके और भीखू की लाश को देखे ही जा रहा था पर अपनी रफ़्तार थोड़ी भी कम नहीं की बढ़ने से रोका नहीं खुद को।मोनिका शर्मा सारथी