बुलबुला/दीपक भारद्वाज

*बुलबुला*
समंदर में उठते बुलबुले
जैसा ही तो है
इंसान
ज्ञात नहीं होता
जिससे कि
कितने दूर जाकर
वो
लहरों में समा जाएगा
मगर फिर भी
वो लहरों से लड़ता है
पत्थरों से
और
पानी के तेज बहाव से
तराशा जाता है
कोई बुलबुला
नायाब कलाकृति बन जाती है
तो कोई बालू भी
मगर
इस दौड़ में
अंजाम सबका एक ही है
थोड़ा दूर जाकर
फिर से लहरों में
समा जाना।

*दीपक भारद्वाज*

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