बहम/ नंद किशोर परिमल

शीर्षक (बहम)
बहम बुरी बला है, इसे न पाले कोई।
सर्वस्व यह बर्बाद करे, फिर बचे न इससे कोई। अब तक तो बहम की, नहीं कोई बनी दवाई।
इक परस्पर विश्वास के, दवाई अन्य नहीं है कोई।
पलने वाले बहम में, रातों रात अमीर हैं बनते।
सुबह उठकर देखें, दो कदम आगे नहीं सरके होते।
कितने ऐसे लोग अर्श से हैं फर्श पर रोजाना गिरते।
खुद तो जीवन भर रोएं, औरों की लुटिया भी हैं डुबोते।
बहम के शिकार कई देश तक भी हैं होते देखे। दिन में तोड़ें तारे और रात को वे नहीं सोते।
बहम बहम में जीवन के विकास क्रम को मत रोको।
वास्तविकता को पहचानों और आगे बढ़ने वाले को मत रोको।
जिस जिसने बहम छोड़, ज्ञान की ज्योति जलाई।
छोड़ सपनों की दुनिया उसने, जिंदगी भव्य बनाई।
बहम की दुनिया से बाहर निकलो, परिमल यह समझाए।
जीवन सफल बने तभी और जग में खुशियाँ छाएं।
नंदकिशोर परिमल, गांव व डा. गुलेर
तह. देहरा, जिला, कांगड़ा (हि_प्र)
पिन. 176033, संपर्क. 9418187358

One comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *