जी चाहता है/नंद किशोर परिमल

जी चाहता है
आज न जाने क्यों, कवियों की महफिल में जाने को जी चाहता है।
मन में छुपी बात – सुनाने को जी चाहता है
रूठी हुई मां शारदे को – मनाने का जी चाहता है।
आज कवियों की महफिल में जाने को जी चाहता है।
आप सब कवि – साहित्यकारों के बीच,
जाने को जी चाहता है।
आज तक जो लिख न पाया, उसे लिखने लिखाने को जी चाहता है।

आप ही बताइए कि क्या बात होगी?
इस ढलती उम्र में, कुछ सुनाने को जी चाहता है।
मन की दबी बातें-बाहिर आने को आतुर,
उन्हें व्यां करने को जी चाहता है।

बाली – इंडोनेशिया – मलेशिया, वैश्विक संस्कृति महोत्सव में, कवि – साहित्यकारों की महफिल में,
अगली बार कुछ सुनाने की बात कर आया,
उसे आपको बताने का जी चाहता है।
क्या अगली बार, उन्हें कुछ सुना पाऊंगा?
आपसे जानने को जी चाहता है।

आपकी महफिल में आकर_
कुछ बन जाने को जी चाहता है।
आपसे बहुत कुछ लेने को और थोड़ा सा
देने को जी चाहता है।
आज तक था जो मौन, उसे तोड़ने को जी चाहता है।
आपकी महफिल में आ कर_परिमल,
कवि बन जाने को जी चाहता है।
आज न जाने क्यों, कवियों की महफिल में
जाने को जी चाहता है।।
नंदकिशोर परिमल
गुलेर (कांगड़ा), हि-प्र
पिन 176033

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