ग़ज़ल
चलते चलते रुकता क्यूँ है
सबके आगे झुकता क्यूँ है

सारे मुझको ताने मारें
सबकी बातें सुनता क्यूँ है

अपनी अपनी करते सारे
मन ये तेरा दुखता क्यूँ है

करता जो है वोही भरता
मुझको एसा लगता क्यूँ है

अंधों की नगरी है यारा
मुझको ही बस दिखता क्यूँ है

मतला कोई बन ना पाए
उल्टा पुल्टा लिखता क्यूँ है

आदर हो ना कोई तेरा
घर बेगाने टिकता क्यूँ है

मैंने तुझको क्या है बोला
एसा तुमने समझा क्यूँ है

करले अब तू अपनी मर्जी
मुझसे नाहक उलझा क्यूँ है

लूटें मारें चौराहों पर
मानव इतना सस्ता क्यूँ है

जलती है रोजाना बस्ती
कोई इसमें बस्ता क्यूँ है

सुरेश भारद्वाज निराश
धर्मशाला हिप्र