चम्बा रुमाल सांस्कृतिक विरासत

*इस बार मिंजर मेले में चंबा रुमाल को मिले विशेष स्थान*

*डलहौज़ी हलचल (चुवाड़ी)* :-उपमंडल भटियात के बहुचर्चित लेखक व् समाज सेवक आशीष बहल ने इस बार अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेले में चंबा की पहचान चंबा रुमाल को विशेष स्थान दिए जाने का सुझाव उपायुक्त चंबा सुदेश मोख्टा को भेजा है. उन्होंने अपने सुझाव में कहा है कि मिंजर मेला जिसे चम्बा की शान कहा जाता है इसी महीने मनाया जाएगा। इस बार इसे ओर अधिक आकर्षित बनाने के गणतंत्र दिवस की तर्ज पर जिस प्रकार की झांकी दिखाई गई थी ठीक उसी प्रकार प्रकार का मॉडल चम्बा में मिंजर मेले के उपलक्ष्य पर रखा जाए। उन्होंने कहा कि इससे न केवल चम्बा की प्राचीन कला को पहचान मिलेगी साथ ही बाहर से आने वाले लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र होगा।

*कौन है आशीष बहल*

जिला चंबा के भटियात उपमंडल के चुवाड़ी में रहने वाले आशीष बहल आज एक उभरते हुए लेखक है और विभिन्न राष्ट्रीय पत्रिकाओं में लेखक और कवि के रूप में उनकी पहचान बन चुकी है. वर्तमान में वे जेबीटी अध्यापक के रूप में कार्य कर रहे है. एक अध्यापक के रूप में ये उनकी मेहनत का ही नतीजा है कि भारत सरकार की ऑफिसियल वेबसाइट माय गोव पर विभिन्न एक्टिविटी में सक्रिय भागीदारी को दर्शाने वाली उनकी एक्टिविटी जिसमे प्रसिद्ध बाथू की लड़ी मंदिर के साथ विद्यालय में बच्चो के साथ कि गयी गतिविधियों को भारत सरकार ने ने न केवल एप्रूव किया बल्कि उसे शेयर भी किया। अपने मित्रों के साथ मिलकर एक RFC क्लव बनाया है जिसमें समाज और शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे हैं

*ये है चंबा रुमाल का इतिहास* written by Ashish Behal

हिमाचल की संस्कृति को हमेशा लोगो के दिलों में वसाए रखने में जिला चम्बा का अपना एक अहम योगदान रहा है। चम्बा रुमाल भी उनमें से एक है। चम्बा रुमाल की अद्भुत कशीदाकारी काफी प्राचीन है 16 वीं शताब्दी से भी पहले की ये कला चम्बा ही नहीं बल्कि आसपास भी काफी प्रसिद्ध थी शुरू में ये काँगड़ा , नूरपुर, मंडी और जम्मू के वासोहली में पहाड़ी चित्रकला के रूप में काफी प्रसिद्ध थी। पहाड़ी चित्रकला और शिल्पकला का चम्बा रुमाल एक अनूठा मिश्रण है। ऐसा भी विश्वास है कि 16वीं शताब्दी ‘बेबे नानकी’ जो कि गुरु नानक देव जी की बहन थी द्वारा गुरु नानक जी को भेंट किया गया रुमाल आज भी होशियार पुर के गुरूद्वारे में संरक्षित किया गया है जिसे कि चम्बा रुमाल की सबसे प्राचीन कृति के रूप में कुछ लोग मानते हैं।
17 वीं सदी में राजा पृथ्वी सिंह ने चम्बा रुमाल की कला को बहुत अधिक संवारा और रुमाल पर “दो रुखा टांका” कला शुरू की। राजा पृथ्वी सिंह ने महिलाओं के लिए शिक्षा के स्थान पर चम्बा रुमाल की कला को सीखना अनिवार्य किया गया तथा हर शुभ कार्य में चम्बा रुमाल भेंट करने की रस्म शुरू की जो आज भी प्रचलित है लोग आज भी विवाह आदि रस्मों में एक दूसरे को चम्बा रुमाल भेंट करते है यही कारण है कि आज भी ये कला लोगो के बीच में जिन्दा है।
18 वीं शताब्दी में चम्बा रुमाल का काम जोरो पर था। बहुत से कारीगर इस कला से जुड़े थे। उस समय के राजा उमेद सिंह ने इस कला को और कारीगरों को संरक्षण दिया तथा चम्बा रुमाल की कला को दूर तक पंहुचाया। लन्दन के विक्टोरिया अल्बर्ट म्यूजियम में रखा गया चम्बा का रुमाल इसके महान इतिहास के दर्शन करवाता है जिसे चम्बा के राजा गोपाल सिंह ने 1883 में ब्रिटिश सरकार के नुमाइंदों को भेंट किया था जिसमे कुरुक्षेत्र युद्ध की कृतियों को उकेरा गया है। 1911 में चम्बा के राजा भूरी सिंह के द्वारा भी इस हुनर को बहुत सम्मान दिया गया दिल्ली दरबार में ब्रिटिश सरकार को चम्बा रुमाल की कई कलाकृतियां भेंट की।

*अद्भुत कला और कशीदाकारी का नमूना है चंबा रुमाल*

चम्बा रुमाल अपने अद्भुत कला और शानदार कशीदाकारी के कारण निरन्तर प्रसिद्धि की नई इबारत लिखता गया। चम्बा रुमाल की कारीगरी मलमल , सिल्क के तथा कॉटन के कपड़ो पर की जाती है जो कि वर्गाकार तथा आयातकार होते हैं। कई प्रकार की कलाओं को इसमें अंकित किया जाता है जिसमे मुख्यतः श्री कृष्णलीला को बहुत ही सुंदर ढंग से रुमाल के ऊपर दोनों तरफ कढ़ाई करके उकेरा जाता है तथा साथ ही महाभारत युद्ध, गीत गोविन्द से लेकर कई मनमोहक दृश्यों को इसमें बड़ी ही संजीदगी के साथ बनाया जाता है। रुमाल पर खास तरह की कढ़ाई करने की इस कला का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेटेंट करवाया गया है। रुमाल पर की गई कढ़ाई ऐसी होती है कि दोनों तरफ एक जैसी कढ़ाई के बेल बूटे बनकर उभरते हैं। यही इस रुमाल की खासियत है।

*लोक संस्कृति में चंबा रुमाल का है विशेष स्थान*

यहां की लोक संस्कृति और गीतों में भी रुमाल की बात सुनने को मिलती है। लोकगीतों में ये लोकगीत
*“राम लछमन चोपड़ खेलदे,
सिया रानी कडदी कसीदा”*
काफी प्रसिद्ध है जो कि कई खास मौकों पर गाया जाता है।
लोगो के निजी जीवन व पारंम्परिक रीती रिवाजो में भी चम्बा रुमाल को अहम स्थान दिया जाता है चम्बा के लोग विवाह शादी के समय दूल्हे दुल्हन को शगुन स्वरूप चम्बा रुमाल भेंट करते हैं। पुराने समय में राजपरिवारों में भी चम्बा रुमाल को भेंट स्वरूप दिया जाता था यही कारण है कि चम्बा की पारम्परिक कला आज भी लोगो में उतनी अधिक प्रसिद्ध है।
साभार :- डलहौजी हलचल

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