चम्बा के ऐतिहासिक मिंजर मेला पर ये बहुत ही खूबसूरत लेख ….इस लेख में आपको मिंजर का सम्पूर्ण इतिहास जान ने को मिलेगा की वास्तव मे मिंजर किस तरह से मनाई जाती है ….जैसा की आप सभी को विदित है इस बार Covid -19 की वजह से मिंजर सिर्फ रस्मी तोर पर ही मनाई जा रही है । मगर सैकड़ो वर्षों से चम्बा में मिंजर पूरी भव्यता के साथ मनाई जाती रही है ऐतिहासिक,सांस्कृतिक और धार्मिक समभाव का अनूठा मिश्रण इस मिंजर मेले में देखने को मिलता है । मझे उम्मीद है की आप सभी को ये लेख पड़ने के बाद मिंजर का वास्तविक एहसास होगा । मिंजर त्यौहार की आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें ।

धन्यवाद

आंकांक्षात्मक जिला ‘’चम्बा’’ में इस वर्ष 26 जुलाई से 2 अगस्त तक ” नया चम्बा” थीम के साथ परम्पारिक विश्व-प्रसिद्ध मिंजर मेला मनाया जा रहा है l अपनी ऐतिहासिक और अद्भुत सांस्कृतिक धरोहर को समेटे ‘मिंजर मेले ‘ के आगाज के साथ ही, इन दिनों ‘चम्बा’ सचमुच ‘अचम्भा ‘नजर आता है I प्रकृति-प्रदत सुंदरता लिए ऐतहासिक चौगान मैदान में सजे पंडाल, चारो ओर रौशनी से सरोवर चम्बा शहर की ऐतहासिक इमारतें और रंग-विरेंगे परिधानों में सजे लोगों का हुजूम मिलकर बहुत ही मनमोहक नजारा पेश करते है I देवभूमि हिमाचल में देवी-देवताओं का वास कहा जाता है । यहाँ की संस्कृति और परंपराएं बहुत समृद्ध है I यूँ तो प्रदेश भर बहुत से मेले, त्यौहार और उत्सव मनाए जाते हैं, लेकिन शिवभूमि ‘चंबा’ का मिजर मेला अपने अनूठे गंगा-जमुना संस्कृति के चलते प्रदेश में ही नहीं बल्कि पूरे देश भर में प्रसिद्ध है । चंबा शहर राजा साहिल बर्मन द्वारा उनकी बेटी राजकुमारी चंपावती के कहने पर रावी नदी के किनारे बसाया गया था। इसीलिए इस शहर का नाम चंबा रखा गया था। ‘’मिंजर मेला ‘’ श्रावण मास के दूसरे रविवार को शुरू होकर सप्ताह भर चलता है। स्थानीय लोग मक्की और धान की बालियों को ’’मिंजर’’ कहते हैं। इस मेले का आरंभ रघुवीर जी और ”लक्ष्मीनारायण” भगवान को धान और मक्की से बना मिंजर या मंजरी और लाल कपड़े पर गोटा जड़े मिंजर के साथ, नारियल और ऋतुफल भेट कर किया जाता है l इस मिंजर को एक सप्ताह बाद रावी नदी में प्रवाहित किया जाता है l मक्की की कौंपलों से प्रेरित चंबा के इस ऐतिहासिक उत्सव में मुस्लिम समुदाय के लोग कौंपलों की तर्ज पर रेशम के धागे और मोतियों से पिरोई गई मिंजर तैयार करते हैं । जिसे सर्वप्रथम लक्ष्मी नाथ मंदिर और रघुनाथ मंदिर में चढ़ाया जाता है और इसी परंपरा के साथ मिंजर महोत्सव की शुरूआत भी होती है I लोककथाओं के अनुसार मिंजर मेले की शुरूआत 935 ईसवी में हुई थी। जब चंबा के राजा त्रिगर्त (काँगड़ा) के राजा , पर विजय प्राप्त कर वापिस लौटे थे तो स्थानीय लोगों ने उन्हें गेहूं, मक्का और धान के मिंजर भेंट करके खुशियाँ मनाई थी I तभी से हर वर्ष चम्बा में मिंजर मेला मनाया जाता है जो अब अंतराष्ट्रीय मेले का रूप ले चूका है l

शाहजहां के शासनकाल के दौरान सूर्यवंशी राजा पृथ्वीसिंह ‘रघुवीर जी’ को चंबा लाए थे। शाहजहां ने मिर्जा’ साफी बेग ‘को रघुवीर जी के साथ राजदूत के रूप में भेजा था। मिर्जा साहब जरी गोटे के काम में माहिर थे। चंबा पहुंचने पर उन्होंने जरी का मिंजर बना कर रघुवीर जी, लक्ष्मीनारायण भगवान और राजा पृथ्वीसिंह को भेंट किया था। तब से मिंजर मेले का आगाज़ मिर्जा साहब के परिवार का वरिष्ठ सदस्य रघुवीर जी को मिंजर भेंट करके करता है । सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार आज भी मिर्जा परिवार के सदस्यों द्वारा मिंजर तैयार कर भगवान रघुवीर को अर्पित किया जाता है। जिसके बाद ही विधिवत रूप से मिंजर मेले का आगाज होता है और मौजूदा समय में भी इस परिवार का वरिष्ठ सदस्य इस परंपरा को पूरी निष्ठा के साथ निभा रहा है। उस समय घर-घर में ऋतुगीत और कूंजड़ी-मल्हार गाए जाते थे। अब स्थानीय कलाकार मेले में इस परंपरा को निभाते हैं। मिंजर मेले की मुख्य शोभायात्रा राजमहल अखंड चंडी से चौगान से होते हुए रावी नदी के किनारे तक पहुंचती है। यहाँ मिंजर के साथ लाल कपड़े में नारियल लपेट कर, एक रूपया और फल-मिठाई नदी में प्रवाहित की जाती है । मिंजर मेले में स्थानीय ही नहीं बल्कि अन्य जिलों और राज्यों से भी लोग मेले का आनंद लेने पहुंचते हैं। इस मेले में हाथ से बना सामान काफी बिकता है जैसे चंबा रूमाल, चुक्ख, चंबा-चप्पल जरीश और अन्य हेंडीक्राफ्ट वस्तुएं जो कि चंबा की विशेषता है । इसके अलावा और भी वस्तओं का व्यापार होता है । पूरा ऐतिहासिक चौगान मैदान विभिन्न अस्थाई दुकानों, स्टालों और झूलों से भर जाता है I पूरे जिलें से लोग खरीददारी करने के लिए मिंजर मेले में आते है I इसके अतरिक्त विभिन्न सरकारी विभागों द्वारा प्रदर्शनिया लगाई जाती है I स्थानीय चम्ब्याली धाम से ले कर राजस्थानी, गुजराती, पंजाबी और अन्य राज्यों के खाना व् पकवान मिंजर में परोसे जाते है I हर रोज शाम को आयोजित होने वाली सांस्कृतिक संध्या मनोरजन व् संस्कृति की छटा बिखेरती है I यद्यप्पी आज कल महंगे बॉलीवुड के गायको व् कलाकारों की प्रस्तुत्तियों को अधिक महत्व दिया जा रहा है I ऐसे में हिमाचली व् स्थानीय कलाकारों को अपनी प्रस्तुतियों के लिए अधिक समय नहीं मिल पाता जिसका मलाल हर वर्ष स्थानीय कलाकारों को रहता है I मिंजर मेले के उपलक्ष में विभिन्न खेल प्रीतयोगितयों का आयोजन भी होता है I देश भर से खिलाडी अलग -अलग टीमों में वॉलीबॉल, बैडमिंटन, क्रिकेट ,हॉकी आदि खेलो में उत्साह से भाग लेते है I चौगान मैदान में होने वाली कुश्ती का अपना ही आकर्षण होता है I देश भर से नामी पहलवानो की कुश्ती को देखने के लिए भारी संख्या में दर्शक उमड़ पड़ते है I अपने विभिन्न आयामों के साथ मिंजर मेला एक उत्सव की तरह चम्बा में मनाया जाता है I

चम्बा में हिन्दू -मुस्लिम जिस सौहार्द से सदियों से रहते रहे है, धर्मनिरपेक्ष समाज का यह बहुत ही अनुकरणीय उदाहरण है , जहाँ कुछ संकीर्ण विचारधारा के लोग एक दूसरे धर्म- स्थानों में प्रवेश को भी वर्जित मानते है, वहीँ चम्बा के मिंजर मेले की शुरुआत ही मुस्लिम ”मिर्जा परिवार” द्वारा भगवन रघुनाथ और लक्ष्मी-नारायण की पूजा -अर्चना व् मिंजर भेंट कर की जाती है I धार्मिक सौहार्द का इस से सुन्दर उदाहरण और कहाँ मिलेगा I

विपन शर्मा

प्रधानाचार्य

राजकीय महिला औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान

(आई..टी. आई) चम्बा हिमाचल प्रदेश