घटते नैतिक मूल्य, बढ़ते अपराध जिम्मेदार कौन?

हिमाचल भारत का सबसे शांत प्रदेश जंहा के भोले भाले लोग अपनी शालीनता और सादगी के लिए विश्व विख्यात है। कोई भी यदि हिमाचल आता है तो हिमाचल वासियों और यंहा की वादियों की सादगी का कायल हो जाता है। परन्तु पिछले कुछ समय में जैसे हिमाचल के इस स्वस्थ, स्वच्छ और शांतिप्रिय वातावरण को किसी की नज़र लग गयी है। जिस हिमाचल में लोग अपने आपको सबसे सुरक्षित मानते थे आज वंही पर असुरक्षा का एहसास होने लगा है।
बढ़ते अपराध:-

प्रदेश में दिन प्रतिदिन क़त्ल, अपहरण, फिरौती, डकैती और भ्रष्टाचार जैसे मामले सुनने को मिल रहे हैं। इंसान इंसानियत का दुश्मन बना बैठा है। आये दिन ऐसी बातें सुनने को मिलती है कि पांव तले जमीन खिसक जाये। ऐसा प्रतीत होता है जैसे हिमाचल में शालीनता, सत्कार, और प्रेम भाव जैसे मूल्यों का हनन हो चूका है। विश्वास और प्रेम की हत्या कर दी है। हाल ही में एक ऐसा ही दिल दहला देने वाला वाक्य सुनने को मिला कि एक वन रक्षक कर्मचारी की बेरहमी के साथ हत्या कर के उसे पेड़ के ऊपर टांग दिया ये अभी साबित होना बाकी है पर प्रथम दृष्टा से ये एक अमानवीय कृत्य प्रतीत होता है और घटना भी ऐसी जैसे मानो हिमाचल में नहीं कंही डकैतों के जंगल में हुआ हो। ऐसी हरकत तो देवभूमि कहने वाले हिमाचल में सम्भव नहीं। देवभूमि में तो देवी देवताओं का वास होता है वँहा ऐसा कैसे संभव है।
मूल्यों का पतन:-

ये मूल्यों का ह्रास कैसे हो रहा है ये अपने आप में एक यक्ष प्रश्न बन के सब हिमाचल वासियों के दिलो दिमाग में घूम रहा है। ऐसा कोई एक किस्सा नहीं है , पिछले एक दशक में ही ऐसे ढेरो किस्से हिमाचल के माथे पर कलंक बन कर सज चुके हैं। कुछ समय पहले शिमला में चर्चित युग हत्याकांड ने भी इस देवभूमि को शर्मसार किया था। जंहा एक छोटे से बच्चे का अपहरण कर के उसे मार कर पानी के टैंक में फेंकने की घिनोनी हरकत की थी। तो कुछ सप्ताह पहले बनीखेत डलहौजी में हुए गोपाल हत्याकांड ने भी इंसानियत से विश्वास उठा दिया। आखिर हिमाचल की पावन भूमि को कलंकित करने का ये खेल कंहा से चल रहा है ये बात समझ से परे है। हत्या और अपहरण तो आजकल हिमाचल में एक आम बात हो गयी है। इसके अलावा भी कई ऐसे किस्से सुनने को मिलते हैं जो इंसान को अंदर तक झकझोर कर रख दे। कंही भाई भाई को मार रहा है, तो कंही बेटा माँ को काट रहा है। कंही बलात्कार जैसे घिनोने अपराध को अंजाम देकर रिश्तों की डोर काटी जा रही है। कंही भाई – बहन तो कंही बाप – बेटी के रिश्ते तार तार हो रहे हैं। कभी कभी तो यकीन भी नहीं होता कि हिमाचल में भी ऐसे अपराध हो सकते हैं। हमारी कानून व्यवस्था को शायद ही कभी इतनी मेहनत करनी पड़ी हो जितनी अभी करनी पड़ती है। पहले लोगो में एक दूसरे के प्रति प्यार था,इज़्ज़त थी और सबसे बड़ी बात डर था। डर कुछ गलत करने का इसलिए इंसान कोई भी कदम उठाता था तो उसके सभी पहलुओं पर विचार करता और गलत के डर से पीछे हट जाता।
संस्कारो से पूर्ण हिमाचल:-

ये सब इसलिए था क्योंकि हिमाचल में संस्कार जीवित थे। हर घर में संस्कार और मानवीय मूल्यों को जीवित रखा जाता था । बड़ो की आज्ञा का पालन करना,घर से बिना पूछे बाहर न जाना, परिवार के साथ समय व्यतीत करना, अतिथि देवो भव का पालन करते हुए हर अतिथि को घर का सदस्य मानते हुए उसकी सेवा करनी। ये सब मूल्य हर परिवार में जीवित थे कोई किसी को हानि पंहुचाने के बारे में नहीं सोचता था। मन और तन दोनों साफ़ थे परंतु आज ,आज जैसे इन सब मूल्यों का भी क़त्ल हो चूका है। किसी के मन में किसी के लिए आदर सत्कार नहीं रहा। और डर नाम की चीज़ तो जैसे गायब ही हो गयी है। इसके कई कारण सामने आते हैं सबसे पहला तो अपने परिवार से दूरी, परिवार ही सही मायनों में मूल्यों का दाता होता है। बच्चा जो बात परिवार के बीच रह कर सीखता है वैसा ही उसका व्यवहार होता है जैसा परिवार का माहौल होगा इंसान वही सीखेगा और वैसा ही आचरण करेगा। आज परिवारों के बीच दूरियां आ गयी है पाश्चात्य संस्कृति का अंधाधुंध अनुकरण हो रहा है।परिवार का समय मोबाइल और टीवी ने ले लिया है और जो टीवी और मोबाइल में परोसा जा रहा है हमारी युवा पीढ़ी उसी का अनुकरण कर रही है। और उसी को समाज मे उतार रही है और परिणाम हम देख रहे हैं एक दूसरे से नफरत।
नशे से बढ़ता अपराध:-

दूसरा सबसे बड़ा कारण नशा है। नशा एक ऐसा जहर है जिसके सेवन के बाद इंसान पर अपना जोर नहीं रहता और हत्या, अपहरण, बलात्कार जैसे घिनोने कृत्यों को अंजाम देता है। हिमाचल दिन प्रतिदिन नशा माफिया के चंगुल में फँसता जा रहा है। युवा पीढ़ी नशे के दलदल में इस तरह फंस चुकी है कि अब कंही से निकलती नजर नही आ रही। जिस बचपन में बच्चे खेलो की तरफ ध्यान देते थे अब वो बचपन इंटरनेट पर व्यतीत हो रहा है। मोबाइल फोन अब बच्चो के बचपन से खेल रहा है। दोस्तों के साथ मिलकर रात रात भर रेब पार्टियां करना अब सम्पनता ओर महानता का सिम्बल हो गया है। तन के कपड़ो के साथ साथ अब मन के विचार भी छोटे हो गए हैं।
शिक्षा का अहम स्थान:-

इन मूल्यों के पतन के पीछे कंही न कंही आधुनिक शिक्षा पद्धति भी जिम्मेदार है। पहले यदि बच्चो में किसी प्रकार की गलत हरकत करते थे तो अभिभावक स्कूल के अध्यापकों को उन्हें ठीक करने का जिम्मा देते थे और अध्यापकों में भी वो रुतबा था कि वो बच्चो को सही मार्ग पर ले आते थे परंतु आज समाज ने अध्यापको और विद्यालयों के हाथों में भी बेड़िया डाल दी हैं। आजकल की शिक्षा व्यवस्था में नैतिक मूल्यों के स्थान पर किताबी ज्ञान को अधिक तबज्जो दी जा रही है। बच्चो में दिन प्रतिदिन नैतिक मूल्यों का हनन हो रहा है और जब तक समाज में मूल्यों की शिक्षा नहीं दी जायेगी इस तरह के वाक्यात बार बार सुनने को मिलेंगे। आज समय आ चूका है जब ऐसे घिनोने कृत्यों को बख्शा न जाये। हमारी कानून व्यवस्था भी कंही न कंही लचर नजर आ रही है चूँकि हिमाचल में ऐसी घटनाओं का बोलबाला नहीं रहा इसी कारण यंहा इन घटनाओं में निपटने में प्रशासन और सरकार को कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी ताकि कानून व्यवस्था को सचारु रूप से चलाया जा सके।
सुसंस्कृत हिमाचल:-

हिमाचल की खूबसूरती सिर्फ यंहा के पर्यावरण में ही नही है हिमाचल की खूबसूरती है यंहा के लोगो से ,यंहा कि संस्कृति से अगर इनका पतन होगा तो हिमाचल कदापि आगे नही बढ़ पायेगा। हिमाचल के लोगो को इस ओर गंभीर होकर सोचना होगा और देखना होगा कि आखिर किस तरह हम अपने मानवीय मूल्यों को जीवित रख सकें। हिमाचल की जो पहचान संसार मे है वो इसी तरह बनी रहे अन्यथा हिमाचल के पर्यटन में भी इसका नाकारात्मक असर पड़ेगा इसलिए आवश्यक है कि हमारे प्रदेश की सरकार भी इस और सख्त कदम उठाए। हिमाचल में होने वाले अपराध पर रोकथाम लगे ताकि ये शांत, शालीन, सभ्य प्रदेश विश्व के मानचित्र पर उसी प्रकार चमके जिस तरह वर्षो से चमकता आया है। आओ मिलकर अपने हिमाचल को एक बार फिर से अपना सुसंस्कृत और भयमुक्त प्रदेश बनाएं।
आशीष बहल
लेखक और विचारक
Jbt अध्यापक
चुवाड़ी जिला चम्बा