लघु कथा

गुलाबजामुन का डिब्बा

” *भाई* का पांच बार फ़ोन आ गया।मैं कैसे जायूँ खाली हाथ राखी बांधने ? गुलाबजामुन के डिब्बे बिना मैं नही जायूँगी ”

*राधा का* पति ये शब्द सुन कर सोचने लगा कि 200 रुपये डिब्बे के लिये कहाँ से लाऊं। दो दिन से काम भी तो नहीं मिला।जो कुछ पैसों की बचत की थी ,वे दो दिन में खर्च हो गए।क्या करूँ? राधा भी गुलाबजामुन के बिना राखी बांधने नहीं जाएगी।

*पति* – पत्नी दोनों ही बेवस निराश बैठे थे ।राधा बार- बार मोतियों से जड़ी राखी को निहार रही थी ।ऐसे ही सोचते – सोचते उसकी आँख लग गयी व सपने में भाई की कलाई पर राखी बांध कर उसके मुहँ में गुलाबजामुन डाल कर गले मिलने लगी, तभी पड़ोसन गीतिका की आवाज से उसका सपना टूट गया।

” *राधा*! आज मेरा भाई राखी बंधवाने आया था।काफी सारे फल व मिठाई लाया था ।बच्चे बाहर रहते हैं।घर में मैं अकेली हूँ।सोचा एक डिब्बा चुन्नू- मुन्नू के लिए दे आयूँ।”

*राधा* के चेहरे पर रौनक आ गयी ।वह जल्दी से डिब्बा पकड़कर दो पीस चुन्नू – मुन्नू को देकर, पति से बच्चों का ध्यान रखने को कहकर मायके जाने के लिये चल पड़ी। एक गुलाबजामुन का डिब्बा उसके लिये किसी अमूल्य हीरे से कम नहीं था क्योंकि उसी डिब्बे के कारण ही भाई की सूनी कलाई पर राखी बांधनी थी वह मन ही मन में गीतिका को लाखों आशीष दिये जा रही थी।

Sunita Goyal
Mandi Dabwali
Haryana