गंगथ छिंज मेला हमारी सांस्कृतिक धरोहर/आशीष बहल


गंगथ छिंज मेला हमारी राष्ट्रीय सांस्कृतिक धरोहर

हिमाचल प्रदेश में मेले, त्यौहार ओर पर्व अपनी एक विशेष पहचान रखते हैं। हिमाचल में मनाए जाने वाले अधिकतर मेलों और त्योहारों में प्राचीन संस्कृति की झलक दिखती है और साथ ही आपसी प्रेम और भाई चारे की महक भी इन मेलों से मिलती है। हिमाचल में अलग अलग समय मे कई जगह मेले लगते रहते हैं उनमें से ही छिंज मेले यानी दंगल हिमाचल में काफी लोकप्रिय है। हिमाचल के छिंज मेले आजकल ज्येष्ठ माह में लोगों का भरपूर मनोरंजन करते हैं और साथ ही लोगो को तन्दरुस्त रहने का भी सन्देश देते हैं।

क्यालू देव को समर्पित :-


एक ऐसा ही छिंज मेला है “गंगथ” शहर में क्यालू देव महाराज की पवित्र धरती में लगने वाला भारत के सबसे बड़ा छिंझ मेला। “गंगथ” जिसे प्रसिद्ध “भांडे वाले शहर” के नाम से भी जाना जाता है। गंगथ जिला कांगड़ा का एक प्रसिद्ध और प्राचीन शहर है और यंहा पर विश्व का एक मात्र क्यालू बाबा का विश्वप्रसिद्ध मंदिर है जिस पर लोगो की इतनी गूढ़ आस्था है कि लाखों के हिसाब से चढ़ावा यंहा अकेले एक एक भक्त ही अर्पित कर देता है। यंहा हर साल 3 दिन का महादंगल यानि छिंज मेला मनाया जाता है जो कि बाबा क्यालू देव जी को समर्पित होता है।

गंगथ में है सफेद शिवलिंग :-


गंग से बने गंगथ में है अदभुत शिवलिंग। गंगथ की आप पूरी कहानी यंहा पढ़े श्री सुखदेव जी की रिपोर्ट फोकस हिमाचल में

लाखों लोग आते हैं मेले में :-

ये अपने आप का एक ऐसा अनोखा दंगल है जिसे देखने और इसमें हिस्सा लेने के लिए पूरे देश से नामी अखाड़ा पहलवान आते हैं। हर साल मनाया जाने वाला ये मेला भारत की अद्भुत कला और संस्कृति का प्रतीक है। दंगल खेलने की कला भारत मे हजारों साल पुरानी मानी जाती है जब पूरे विश्व मे ओर कोई खेल अस्तित्व में नही थे तब भी लोगों के लिए ये मनोरंजन और साथ ही अपने आप को तन्दरुस्त रखने का एक साधन माना जाता था।

दंगल भारत के कोने कोने में होते हैं छोटे स्तर से लेकर बड़े स्तर तक। गंगथ का ये दंगल अपने पुराने स्वरूप को बचाये हुए है। कई सौ सालों से मनाया जाने वाला ये मेला आज भी बहुत उत्साह से मनाया जाता है। लाखों की संख्या में लोग इस मेले में हिस्सा लेते हैं। परन्तु अफसोस इस बात का है कि इतना बड़ा और प्रसिद्ध मेला होने के बावजूद भी ये एतिहासिक मेला सिर्फ जिला स्तरीय ही है न तो आज तक इसे राज्य स्तरीय दर्जा मिला जबकि इस मेले में भाग लेने के लिए और देखने के लिए पड़ोसी राज्यों पंजाब, हरियाणा, दिल्ली इत्यादि से लोग पँहुचते हैं। इसलिए ये आवश्यक है कि इसे भारत की पारम्परिक विरासत ओर धरोहर मानते हुए इसे राष्ट्रीय स्तर का मेला घोषित किया जाये। ईस मेले को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिले ये बहुत आवश्यक है।

भारी इनामों की बारिश :-

मेले की जो सबसे खास बात है वो है यंहा पर पगलवानो को दी जाने वाले ईनाम है जिसे स्थानीय भाषा मे “माली” और “झण्डी” कहा जाता है। यंहा पर मेले के दंगल में विजेता पहलवानों को पहला ईनाम ट्रेक्टर दिया जाता है इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस मेले की अहमियत क्या होगी। और यही कारण है कि देश के नामी पहलवान ओलम्पिक विजेता तक इस दंगल में अपने दांव पेंच लड़ाते नजर आते हैं। इसके अलावा दूसरे नम्बर का ईनाम जिसे माली कहा जाता है वो आल्टो कार होती है।

साथ ही मोटर साइकिल, साइकलें कई एलसीडी, फ़ोन और भी हजारों इनाम दिए जाते हैं। हिमाचल के पहलवानो को प्रोतसाहित करने के लिए “हिमाचल केसरी” का खिताब दिया जाता है साथ ही “गंगथ केसरी” के लिए भी लोकल पहलवानों को आपस मे भिड़ने का अवसर मिलता है। इन सबका आयोजन गंगथ छिंज कमेटी के सदस्य ही करते हैं।

बेटियों को भी दंगल लड़ने का मौका :-

पिछले 2 सालों से एक नया अभियान शुरू करते हुए “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” के नारे को आगे बढ़ाते हुए “खेलो बेटी” का भी नारा गंगथ छिंज मेले में साकार किया जा रहा है। मुख्यतः पुरुष प्रधान माने जाने वाले इस खेल में महिलाओं को भी पूरा मौका मिले इसके लिए गंगथ छिंज मेले में महिला कुश्ती भी आकर्षण का केंद्र रहती है। बेटियों को घरों की चार दिवारी से निकल कर अपने हुनर को दिखाने का एक सुनहरा अवसर मिलता है। ये अपने आप मे पूरे भारत मे एक अनोखी और सराहनीय पहल है क्योंकि महिला कुश्ती को इस तरह लाखों लोगों के बीच लेकर आना महिलाओं के हौंसले को बढ़ाना एक बहुत बड़ा कदम है। यही कारण है कि देश के कई हिस्सों से बेटियाँ अपने युद्ध कौशल का परिचय देने के लिए अखाड़े में उतरती हैं। देश के नामी अखाड़ों से बेटियाँ आकर अपने पारम्परिक हुनर का परिचय देती हैं। इससे न केवल उन बेटियों का हौंसला बढ़ता है बल्कि हिमाचल की बेटी भी जो पहाड़ पर काम करके अपने आप को सशक्त करते हुए इस खेल के हिस्सा बनने के लिए प्रेरित होती है।

नामी पहलवान करते हैं शिरकत :-

हर साल जून माह में तीन दिन यानी 3 जून से 5 जून तक चलने वाले इस महादंगल में सैंकड़ो पहलवान अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हैं। इस दंगल में ओलम्पिक विजेता “योगेश्वर दत्त” , सुशील कुमार जैसे ओलम्पिक मैडल जितने वाले अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी भी पँहुचते हैं। परन्तु अफसोस इस बात का है कि इतना बड़ा मेला होने के बावजूद भी इसे राष्ट्रीय दर्जा हासिल नही है। ये मेला न राज्य स्तरीय है इसे जिला स्तर का ही दर्जा हासिल है। भारत मे अपने आप का ये अनोखा ओर एतिहासिक , सांस्कृतिक मेला भारत के हर जगह प्रसिद्ध हो इसके लिए सरकार को इस मेले को राष्ट्रीय मेलों में शुमार करना बहुत जरूरी है।

भांडे वाला शहर :-

इस मेले की जो एक ओर खास बात है वो है यंहा के “भांडे वाले शहर” को चिरतार्थ करती इसकी पहचान। इस मेले में उस समय आप दांतो तले उंगली दवाने पर मजबूर हो जाएंगे जब चारों और फैले वर्तनों को देखेंगे ओर बर्तन भी कोई ऐसे वैसे नही गंगथ में हिमाचल की धरोहर कही जाने वाली हजारों के हिसाब से बटोहिया जो कि पीतल धातु की बनती हैं और गंगथ की एतिहासिक धरोहर होने के साथ साथ सांस्कृतिक विरासत भी है। हिमाचल में मात्र यही एक ऐसी जगह है जो यंहा की मझे हुए कारीगर इन बटोहियों ओर गागर को अपने हाथों से तैयार करते हैं। इस प्रकार की कला आपको कंही ओर देखने को नही मिल सकती। वैसे तो पूरा साल यंहा बर्तनों का कारोबार चलता है जिसमें पड़ोसी राज्यों के लोग भी यंही से पीतल के बर्तन खरीदते हैं परन्तु इन 3 दिनों में जब मेला चलता है उस समय लोगो की आस्था देखने लायक होती है। बाबा क्यालू देव पर लोगो की इतनी श्रद्धा है कि उसे देखकर कोई भी नतमस्तक हो जाएगा। बाबा क्यालू को दान स्वरूप ये पीतल की बड़ी बड़ी बटोहिया चढ़ाई जाती है जिनकी संख्या हजारों में होती है। और एक एक बटोही की कीमत 15 हजार से 30 हजार तक आंकी जाती है। ये बटोहिया यंहा दंगल करने आने वाले विजेता खिलाड़ियों को दी जाती है जिनकी संख्या 101 होती है। हर साल सैंकड़ो बटोहिया ओर हजारों गागर, स्टील की बाल्टियाँ पहलवानों को दी जाती है। जब ये सब बर्तन साथ मे होते हैं तो इस बात की समझ आती है कि हिमाचल में इसे भांडे वाला शहर क्यों कहा जाता है।

खूबसूरती का दूसरा नाम है “खज्जियार”

लोक संस्कृति की झलक :-
तीन दिन तक चलने वाले इस दंगल को सुचारू रूप से चलाने के लिए स्थानीय कमेटी के साथ प्रशासन पूरा सहयोग देता है और हर किसी के साथ न्याय हो इसके लिए कमेटी के सदस्य पूरा ध्यान रखते हैं।
हिमाचल की लोकस संस्कृति की झलक भी इस मेले में खूब देखने को मिलती है। लोग पारम्परिक वेश भूषा के साथ साथ कई प्रकार के वाद्य यंत्रों के साथ झांकी निकालते हैं ये भी एक मनमोहक दृश्य होता है। बर्तनों के साथ ढोल नगाड़ों को बजाते हुए बाबा क्यालू देव के मंदिर तक शोभायात्रा होती है। रात के समय लोक संस्कृति को दिखाते कई कार्यक्रम स्थानीय युवाओं द्वारा दर्शाए जाते हैं। इन सब कार्यक्रमों के लिए कई महीने पहले ही तैयारियां शुरू हो जाती है। आसपास के गांव से लेकर दूर दराज के लोग इसमे अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करते हैं। ये सब देखकर आप को इस बात का एहसास होगा कि हमारे हिमाचल की संस्कृति जितनी प्रचीन है उतनी मजबूत भी। आज की 21 वी सदी जिसे आधुनिक युग कहते है या मशीनी युग उसमे भी दंगल जैसे खेल लोगों द्वारा पसन्द किये जाते हैं और इन एतिहासिक खेलों को बचाने का बहुत अधिक श्रेय इन दंगल कमेटी को जाता है जैसे गंगथ की इस पारम्परिक विरासत की रक्षा वँहा की आने वाली पीढ़ी कर रही है।

व्यापार की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण :-
व्यापार की दृष्टि से भी ये मेला हिमाचल के सबसे बड़े मेलों में इसे खड़ा करता है। यंहा तीन दिन में करोड़ो का व्यापार होता है। छोटे छोटे व्यापारी वर्ग के लिए ये मेले किसी संजीवनी से कम नही होते क्योंकि ये हजारों का सामान लेकर बहुत थोड़े लाभ के लिए अपनी दुकान सजाते हैं। गंगथ छिंज मेले में लाखों के हिसाब से लोग पँहुचते हैं और मेले से कई चीजें खरीदते हैं। शायद ही व्यापार की दृष्टि से इतना बड़ा मेला कंही लगता हो। इसलिए व्यापारिक दृष्टि से भी इसे राज्य स्तरीय और राष्ट्रीय स्तरीय होना बहुत आवश्यक है।

इस प्रकार की प्राचीन संस्कृति और मेलो को संरक्षण देकर सरकार इसे आमदनी का स्त्रोत भी बना सकती है। यदि गंगथ जैसे मेले राष्ट्रीय स्तर के मेलो में शामिल हो तो बाहरी राज्यों के और अधिक लोग व्यापार के लिए आकर्षित हो सकते हैं साथ ही इन मेलों को पर्यटन से भी जोड़ा जा सकता है। जैसे इस दंगल में बर्तनों की इतनी बड़ी संख्या लोगों को स्वतः ही आकर्षित कर सकती है इससे इस काम मे जुड़े लोगों को स्वरोजगार के अवसर तो बढ़ेंगे ही साथ ही ये विलुप्त होती पारम्परिक कला को भी संरक्षित करने में एक बेहतर विकल्प साबित होगा। आज के इस आधुनिक दौर में हम कंही न कंही हाथों के हुनर से दूर होते जा रहे हैं। यंहा पर बनने वाली पीतल की बटोही की कला को संवारने में ये मेला और अधिक भूमिका निभा सकता है । इसलिए हिमाचल सरकार से मैं इस लेख के माध्यम से निवेदन करना चाहूंगा कि अपनी और से इस एतिहासिक और सांस्कृतिक मेले को राज्य स्तरीय घोषित करके भारत सरकार से इसे राष्ट्रीय मेले का दर्जा दिलवाएं। और हम सब हिमाचल वासियों का भी ये कर्तव्य है कि हम अपनी इन प्राचीन परम्पराओं का प्रचार और प्रसार करें ताकि हिमाचल की लोक संस्कृति जीवित रहे, आगे बढ़े और फले फूले। हमारी आने वाली पीढ़ी भी इन मेलों की संस्कृति से आपसी भाई चारे के संदेश ले सके। क्योंकि मेले समाज की वो मजबूत संस्कृति है जिसे हर धर्म, सम्प्रदाय के लोग मिलकर मनाते हैं और उसका भरपूर आनंद लेते हैं।
जय क्यालू देव महाराज की।

आशीष बहल
अध्यापक
चुवाड़ी जिला चम्बा

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