किसान/बी पी ठाकुर

सिसकता किसान
सोने की खान सी,
उर्वर भूमि,
सिसक रही है,
किसान के बदन से,
पसीने की बूंदों संग ,
आंखों से बूंदें गिर रही है,
उर्वर भूमि ,
पहचान गई हैं,
कि,
ये आंसु हैं,
लेकिन ये सरकारें,
कब सिसकेंगी,
कब वह वजहें पहचानेंगी,
जो किसान जैसे योद्धा को रुला रही हैं।

वीपी ठाकुर
कुल्लू

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