श्रधंजलि /जो हमें छोड़ के /सुरेश भारद्वाज निराश

श्रद्धांजलि

जो हमें छोड़ के चले गये
बो खुदा को प्यारे होते है
इतना ही था साथ हमारा
व्यर्थ में यूँ हम रोते है।

वो सच्चे थे वो अच्छे थे
पुरोधा थे दुनियांदारी के
अच्छे थे कर्म भी उनके
शायद मानव अवतारी थे

सीधे रस्ते चलने वाले
सीधी राह दिखाते सबको
अच्छे बुरे के भेद भुलाकर
सच झूठ समझाते सबको

सुख दुख में थे सबके साथी
धर्म कर्म का ज्ञान बड़ा था
विश्वास था उसकी सत्ता पर
पूजा पाठ में ध्यान बड़ा था

दिल से सबका आदर करते
बच्चों से करते थे प्यार
पास पड़ोस अपना लगता
घर सा करते थे व्यवहार।

प्रेयसी थी कविता उनकी
शव्दों से वो खेला करते
प्यारी उनको मातरभाषा
छंद मात्रायें मेला करते

साथ बितायी सारी बातें
छनछन कर अब आती हैं
टीस सी उठती है भीतर
दिल अक्सर बड़ा दुखाती हैं

अम्मां ने आशीष दिया
मस्ताना जी कह गये ‘मस्ताना’
काम अधूरे हमसे जो छूटे
पग पग उनको करते जाना

आज वो अपने साथ नहीं है
निराश उन्हें हम याद करें
सदा सदा वो अमर रहैं
ईश्वर से यहि फरियाद करें।

सुरेश भारद्वाज निराश
धर्मशाला हिप्र

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