हुक़ूममत मिली है

साथ सबका, बिकास कुछ तपका,ये बख़ीली है।
हमारे मुड़े सिर पर हवन, हुज़ूर खूब ज़िंदादिली है।।

राजनीति भी ,अजीब शै है, धार बना देती है।
काटिये बेफ़िकर, आपकी काशी है,दिल्ली है।।

पाँच बरसों में , एक बार शेर बन जाता है बिचारा।
फ़िर बरसों बरसों तक, तो भीगी बिल्ली है।।

क्या करें हम पुरोहित हैं, दिल पिघल जाता है।
आपकी ज़बान भी, जनाब मीठी है, रसीली है।।

क्या असुर, क्या सुर, हम तो सबके सताये हैं।
आप भी सताईये, हुकूमत कुछ दिनों की मिली है।।

पंडित अनिल

गुलाब देगा

क़तरा क़तरा लहू बोलेगा, हर साँस साँस हिसाब देगा।
ज़र्रे ज़र्रे का न्याय होगा, तिनका तिनका हिसाब देगा।।

बदनीयती,बदग़ुमानी,बादशाहत,नाफ़रमानी भूल जाना।
क़ाबिल,नाक़ाबिल,वहाँ,हर कोई अपना हिसाब देगा।।

वो अपनीं आँखों पर,नहीं रखता है पट्टी कोई।
यहाँ के शहनशाह,वहाँ के शहनशाह को ,क्या जबाब देगा।।

यहाँ के ख़जानों का,वज़ूद,वज़न बस है यहीं तक।
वहाँ किसे, कैसे,फ़िर रिश्वत जाकर जनाब देगा।।

नेक नीयत वाले बेशक,पायेंगे पूरा पूरा सबाब।
उनके दामन में,इनाम में, वो महकता गुलाब देगा।।

पंडित अनिल
स्वरचित,मौलिक,अप्रकाशित

ढूँढ़िये

मुस्कुराने को हर लम्हा, हर बहाना ढूँढ़िये।
बचपन भरा,दिल में ख़ज़ाना ढूँढ़िये।।

छोड़िये अजी,शिक़वे गीले, सब ज़िंदगी से।
फ़िर वही अल्हड़,दीवाना ढूँढ़िये।।

मिट न जाये मौज, ज़िंदादिली मस्तियाँ।
हर पहर वो , गुनगुनाना ढूँढ़िये।।

नेकियाँ रुख़सत न हों, दिल से मेहरबाँ।
बाँट कर वो साथ, खाना ढूँढ़िये।।

बेरुखी से ही सही, साथ में बैठिये जरा।
दोस्त कोई अपना, पुराना ढूँढ़िये।।

बेसबब,बेसदा, फ़रियादी ” अनिल ” क्यूँ।
बरसात में छप-छप,नहाना ढूँढ़िये।।

पंडित अनिल