जो देखूँ दूर तलक तो/सलिल सरोज

जो देखूँ दूर तलक तो कहीं बियाबाँ , कहीं तूफाँ नज़र आता है
इस फ़िज़ा की मुस्कराहट के पीछे कोई श्मशान नज़र आता है

इंसानों ने अपनी हैवानियत में आके किसी को भी नहीं बख्शा है
कभी ये ज़मीं लहू-लुहान तो कभी घायल आसमाँ नज़र आता है

मशीनी सहूलियतों ने ज़िन्दगी की पेचीदगियाँ यूँ बढ़ा दी हैं कि
जिस इंसान से मिलो,वही इंसान थका व परेशान नज़र आता है

क़ानून की सारी ही तारीखें बदल गई हैं पैसों की झनझनाहट में
मुजरिमों के आगे सारा तंत्र ही न जाने क्यों हैरान नज़र आता है

किताबें,आयतें,धर्म,संस्कृति,संस्कार,रिवाज़ सब के सब बेकार
शराफत की आड़ में छिपा सारा महकमा शैतान नज़र आता है

बच्चों की मिल्कियत छीनके अपने उम्मीदों का बोझ डाल दिया
मेरी निगाहों में अब तो हर माँ-बाप ही बेईमान नज़र आता है

सलिल सरोज

जिनको जीना है,वो उनकी आँखों से जाम पिया करें
और इसी तरह अपने जीने का सामान किया करें

खुदा किसी के मकाँ का शौकीन तो नहीं रहा
तो दिल में ही कभी आरती तो कभी आज़ान किया करें

हमेशा दूसरों की नज़र में ही अहमियत जरूरी है क्या
कभी तो खुद को भी खुद का ही मेहमान किया करें

इश्क़ की बातें बड़ी मख़सूस हुआ करती है,ज़ानिब
जहाँ तक हो आपसे इसे आँखों से बयाँ किया करें

ये ज़मीन की शहजादियाँ बनेंगी हमारी सारी बच्चियाँ
बस रोज़ इनकी हाथों में दो टुकड़ा आसमाँ दिया करें

बड़ी ही हसीन लगेगी ये सर ज़मीन-ए-हिन्दोस्तान
अपनी गलियों में रोज़ होली और रमज़ान किया करें

सलिल सरोज

क़त्ल हुआ और यह शहर सोता रहा
अपनी बेबसी पर दिन-रात रोता रहा ।।1।।

भाईचारे की मिठास इसे रास नहीं आई
गलियों और मोहल्लों में दुश्मनी बोता रहा ।।2।।

बेटियों की आबरू बाज़ार के हिस्से आ गई
शहर अपना चेहरा खून से धोता रहा ।।3।।

दूसरों की चाह में अपनों को भुला दिया
इसी इज्तिराब में अपना वजूद खोता रहा ।।4।।

जवानी हर कदम बेरोज़गारी पे बिलखती रही
सदनों में कभी हंगामा,कभी जलसा होता रहा ।।5।।

बारिश भी अपनी बूँदों को तरस गई यहाँ
और किसान पथरीली ज़मीन को जोता रहा ।।6।।

महल बने तो सब गरीबों के घर ढ़ह गए
और गरीब उन्हीं महलों के ईंट ढ़ोता रहा ।।7।।

सलिल सरोज

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *