पंडित अनिल जी की रचनाएं

ये हिंदुस्तान है

कदम कदम पर उलझन है इम्तिहान है।
कौन है इससे बेख़र अंजान है।।

अलहदा अंदाज़ है बस हर किसी का।
अलहदा ही हर कोई इंसान है।।

शौक़ का दहलीज रखियेगा सजाकर।
शौक़ और उम्मीद से ये जहान है।।

हसरतों का बाग़ हरदम खिलखिलाये।
दिल रखिये खुला ये रोशनदान है।।

सौ जनम हैं कम अनिल क़ुर्बानी के।
जान मेरी जान ये हिंदुस्तान है।।

पंडित अनिल
स्वरचित,मौलिक,अप्रकाशित
अहमदनगर,महाराष्ट्र
8968361211

तन्हाई

तन्हा अब रहने की, आदत हो गई है।
यूँ मुफ़लिसी मेरी, मुहब्बत हो गई है।।

आग हर सिम्त में, लगी बस लगी है।
प्रेम की डोली लगे, रुख़सत हो गई है।।

मुस्कुराना है बहुत , नियामत यहाँ।
यह यहाँ सबकी , ज़रूरत हो गई है।।

रोईये किस बात पर, भला किस लिये।
धुँधली सी जब ये , किस्मत हो गई है।।

मीठे बोलों से लुटा हूँ , इस कदर से।
दिल में यूँ ऐसों से , दहशत हो गई है।।

पंडित अनिल

परिंदों को

परिंदे ख़रीद कर, आकाश में उड़ाया करो।
बंद करके परिंदों को, मन मत बहलाया करो।।

परिंदे भी पर्यटन को, आते हैं यहाँ ,थकान मिटाने को।
खामखा बेज़ुबानों को, बंदी मत बनाया करो।।

परवाज़ भरते गगन में, पंख लहराते हैं भाते।
पंख नोंच कर इनके,
जश्न मत मनाया करो।।

ऊर्मि ऊर्जा उत्साह, भरते हैं ,ये भी उत्सव मनाते हैं।
ज़िंदगी है ज़िंदगी ,यूँ बेदर्द हो ,मत मिटाया करो।।

ख्वाब इनके भी होते हैं, बिछड़ परिवार से, रोते हैं।
ये भी नेमत हैं भगवान के ,इन्हें मत सताया करो।।

पंडित अनिल

जनता बेचारी

जाहिल लगती है जनता, परधान जी।
कहाँ – कहाँ रख्खूँ करके,पहचान जी।।
कदर नहीं अब सच्चे, रिश्तों की कोई।
कदम -कदम हैं , तुग़मकी फ़रमान जी।।

है भयभीत परिंदा नन्हा,नींड़ में बैठा।
आतातायी कौन चला दे, बान जी।।
कौन नोंच ले पंख-पंख, निज स्वाद में।
आते रहते शमशानी, मेहमान जी।।

जीना मुश्किल क्या, सच है भाई मेरे।
खो गया है क्या, सचमुच इंसान जी।।
खोई शिक्षा ,है बिकी परीक्षा बेचारी।
पढ़े लिखे कुछ, बन गये दरवान जी।।

कंकरों से है , – – – वज़ूद इन पर्वतों का।
कंकरों से क्यों, है शिखर परेशान जी।।
जनता सचमुच,बेचारी बेचारी ही है।
वो भर रहे,बस अपने ख़ानदान जी।।

किसी का डूबे घर कश्ती,ये मस्त हैं।
चिता से खा,हो जाते अन्तर्ध्यान जी।।
वाह विधाता, खूब रचाया विधान जी।
करो कृपा अब तो,देखो भगवान जी।।

पंडित अनिल

बहना को बस दो दिन केवल साल में”

कच्चे धागे में,पक्के रिश्ते का पर्व आया है।
इस रिश्ते पर भी पड़ गई , सर्द छाया है।।

एक बचन देना, लेना बस , केवल रक्षा का।
उस पर भी अब देखिये , ग़र्द समाया है।।

अपनी बहन तो , प्यारी है, प्राण दुलारी है।
दूजे बहन के वास्ते , क्यों,पर्द चढाया है।।

भाई दूज,रक्षाबंधन, बस दो ही दिन है साल में।
बाक़ी दिन हिस्से ,बहन बस दर्द बनाया है।।

रिश्ते भी अब दिन,गिन साथ निभाने हैं क्यों?
पश्चिम का क्यों? रीत, ज़र्द अपनाया है।।

पंडित अनिल

महबूब की मेंहदी

महबूब के नाम की मेंहदी, ये दरिया-ए आग है।
सजा रख्खा है हथेली पर,जैसे महकता बाग़ है।।

शगुन है, सौभाग्य है, ख़तरे की है निशानी भी।
सहज नहीं , सौंदर्य का,ये सप्तम् राग है।।

जितना चटख रंग, उतनी चटख रहे जबाबदारी।
पता ही नहीं , कब है नींद, और कब जाग है।।

बहुत सच है, त्वमेव मात , च पिता त्वमेव।
हरी मेंहदी, सुर्ख़ रंगत, वह भी, बहुत बेदाग है।।

आसान नहीं, किरदार निभाना, वह भी, जीवंत नारी का।
एक नयन सावन है, भादो है,एक नयन फाग है।।

पंडित अनिल

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