प्रारब्ध /आवेग जायसवाल

प्रारब्ध

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चिर निद्रा में सोना है जब
क्यूँकर फिर रोना है तब
छुओ चलो गगन छोर तुम
डर कैसा क्या खोना है कब।।

हृदयों को उल्लासित करके
प्रेम बीज हमें बोना है अब
मौसम ऋतुएँ बदले भी जो
आरंभ जीवन ही होना है तब।।

स्पंदन करती ज्वाला में भी
लह लहाती हैं फसलें सब
मुक वधिर भी करें नृत्य हैं
खेतों में खिले सोना है जब।।

तेरी अलसाई सी जिंदगी
क्यूँकर तुझको ढोना है अब
चल उठ मुसाफिर हो खड़ा तू
ईश्वर निहित ही होना है सब।।

आवेग जायसवाल
958 मुट्ठीगंज इलाहाबाद

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