मन दीवाना/नंद किशोर परिमल

से

मन दीवाना

आज मुझे कुछ हो सा गया है ।
मन कहीं मेरा खो सा गया है ।
जितना संभालूं इसे,नहीं मानता है यह ।
मानो बेलगाम सा घोड़ा यह हो गया है ।
कोई दवा किसी के पास गर हो ,दे दो अभी ।
नहीं तो दुनिया के मेले में यह मानों ।
मन मेरा कहीं जाकर उसमें खो सा गया है ।
चंचल है बड़ा, हवा सम उड़ता फिरे यह ।
लाख मनाया इसे, पर यह तो कहीं खो सा गया है ।
बात मेरी मानता न यह, रोकने पर रुकता नहीं है ।
दीवाना हुआ उड़ता फिरे यह, परिमल के बस में है नहीं अब ।
बेबस और चंचल मन मेरा अब हो सा गया है ।

नंदकिशोर परिमल, सेवा निवृत्त प्राचार्य
सत्कीर्ति निकेतन, गुलेर (कांगड़ा )हि_प्र
पिन 176033, संपर्क 9418187358

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