मन सहम जाता है/बी पी ठाकुर

मन सहम जाता है,
जब कभी,
सोचता हूँ,
आनेवाली पीढ़ियों के बारे,
पैसों के ढेर बेकार होंगें,
क्योंकि,
आशियाने के चहुँ ओर कंक्रीट के जंगल होंगे।

विरासत में,
संपन्नता देंगे,
विज्ञान द्वारा इजाद,
ऑक्सीजन देंगें,
लेकिन,
ताजी हरे भरे वृक्ष की हवा शायद ही दे पाएंगे।

सम्मुख प्रशन खड़े होंगें,
और…
हम निरुत्तर,
मौन होंगे,
क्योंकि पछताने के सिवा विकल्प नहीं होंगे।
बी पी ठाकुर

काव्य महक की शानदार कविताएं पढ़िए


भारत का खजाना देश की सबसे बड़ी ऑनलाइन पत्रिका लेकर आए हैं “काव्य महक” का प्रथम अंक
रचनाकार हैं
डॉ प्रत्युष गुलेरी
श्री अशोक दर्द
पंडित अनिल
डॉ कुशल कटोच
श्री विजय भरत दीक्षित
पढिये और शेयर करिये।।।

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