सजल/कविता/बृजेश पाण्डेय बृजकिशोर

सजल

हमें भी ऐसे ही बहाने से बुलाइए।
किसी रोज अपना दीदारे कराइए।

खेत की पगडंडियों में दौड़ लगाऊं
बालियों के जैसे गुनगुनाते बुलाइए।

आसमां से चाँद की शबनम उतारिए
धानी चूनर में रंगीन सितारे सजाइए।

लाख कोशिशें करें जतन तमाम हों
अश्क भीगी पलकों में कैसे छुपाइए।

रोज नये करतब विभात तुम्हें दिखाते हैं
मेहरबानी शायद आप भी हमें दिखाइए।
—बृजेश पाण्डेय बृजकिशोर ‘विभात

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