राम भगत नेगी की शानदार कविताएँ

बच्चे किसी की नहीं सुनते

बच्चे किसी की नहीं सुनते
अपनी मन की वे करते

मन के सच्चे अच्छा बुरा का क्या ज्ञान
वे तो अब भी है बिल्कुल नादान

खेल कूद ही उनका संसार
बच्चों को कैसे करें हम इनकार

कब सुबह कब शाम
उनको मौज मस्ती से कहां आराम

पर आज कल के बच्चों का
खेल मोबाईल में गेम

टीवी में कार्टून नेटवर्क
और खाने में पिजा जैम

इस से वे अपने संस्कृति भूल रहे है
अपने पराये को सम्मान नहीं कर रहे है

गुरु दोस्त बन गया चरण छूना भूल गया
आज का बच्चा खुद महान बन गया

क्योंकि आज का बच्चा डिजिटल बन गया
आज हम सब का घर नेट से जुड़ गया

तभी बच्चे अब किसी कि आज नहीं सुनते
अपने मन की ही आज वे करते

मौलिक अप्रकाशित
राम भगत किन्नौर

मनाली मत जइयो/अटल बिहारी वाजपेयी

वक़्त में अपने भूल जाते है

दुनियाँ बहुत बड़ी है
विश्वास में दुनियाँ खड़ी है

बहुत फासले है जमीन आसमान मेँ
एक दूसरे के सम्मान में

यहां दिल मिलते है फूल खिलते
सपने दिखा कर कोई भूल जाते है

कभी वक़्त था दिलों में रात खुलती ना थी
आज वक़्त ऐसा हेल्लो हाय भी होती नहीं

ऐसा भी सफर है जिंदगी के
अपने भी बेगाने बनते देखे है

बड़ी अदभुत है दुनियाँ वो पास थे तो जीना सीखा
वो दूर गये तो दर्द ही दर्द दिखा

इतना मज़बूर नहीं था वो प्यार
आगे बढ़ते ही भूल जाए

चांदनी रात तक हम याद ना आए
सुबह दोपहर तो अब क्या बताए

ऐसा भी सफर है जिंदगी के
अपने भी बेगाने बनते देखे है

मौलिक अप्रकाशित
राम भगत किन्नौर
9816832143

क़दम मिलाकर चलना होगा/अटल बिहारी वाजेपयी

तेरा साया

में तेरा साया था
तेरा ही सहारा रहूँगा

कोई शिकायत नहीं है
कोई हिदायत भी नहीं है

तुम जहां जहां में वंहा वहां
मुझको नहीं किसी गैर की परवाह

तुम बदलो जमाने के लिए
अपने पराये के लिए

कोई शिकायत नहीं
कोई हिदायत भी नहीं

मैं तेरा साया था
तेरा ही सहारा रहूँगा

जब भी याद आए
कठोर दिल को खोल देना

मैं फिर से लौट आऊंगा
मर कर भी लौट आऊंगा

यमराज भी आया हो तब मुझे ले जाने
दो पल की मुलाकात के लिए लग जाऊगा उसे मनाने

मैं तेरा साया था
तेरा ही सहारा रहूँगा

मौलिक अप्रकाशित

राम भगत किन्नौर
9816832143

केंद्रीय विद्यालय में बम्पर भर्ती यँहा पढ़ें पूरी जानकारी

तकदीर का खेल

खेल रहे है हम तकदीर का खेल
कही जैल तो कहीं है दिलों का मेल

हर तरफ रुसवाई ही दिखी यंहा
कोई संतुष्ट नहीं दिखा यंहा

हर कोई परेशान है अपनों से अपने आप से
कहीं बादल तो कहीं सूर्य की ताप से

रोज मर रहे है लोग बेरोजगारी और भुखमरी से
दिलों के मिलन औरे और बिछुड़ने से

यंहा कोई नहीं दिखता अपना या पराया
सबने अपना जीवन चक्र है यंहा चलाया

सब देखते है तमाशा एक दूसरे के चरित्र के
सुदामा और कृष्ण जैसे मित्र के

मत घबरा राम भगत इन सब के झमेलों से
जीवन के इस रंग बिरंगी खेलों से

बस हाथ पकड़ कर चल अपने साथीयों से
तकदीर खुद ही बदल जाएगी एक दिन

मौलिक अप्रकाशित
राम भगत kinnaur

My blog हिमाचली पटल पर “अटल” स्मृति/Ashish

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