ईमानदारी अपनी लुटाये बैठे हैं/पंडित अनिल

बैठे हैं

ईमानदारी अपनी लुटाये बैठे हैं।
कितना आडंबर बनाये बैठे हैं।।

रोशनी देने का दावा कर रहे हैं,वो।
जो खुद दिया बुझाये बैठे हैं।।

बात थोड़ी सी सम्हलती है नहीं।
आग का दरिया खुदाये बैठे हैं।।

छीनकर ख़ुशियाँ मसीहा हैं बने।
महल जो अपना सजाये बैठे हैं।।

देखिये अंदाज़ ज़हरीला तो है।
फूल झूठे से खिलाये बैठे हैं।।

मन पकड़ने की अदा सिखला रहे हैं,वो।
जो अपने तोते उड़ाये बैठे हैं।।

कालिमा मन हटाना हटाना बता रहे हैं वो,।
जो जन्मों की धूल जमाये बैठे हैं।।

पंडित अनिल

कौन सम्हारेगा ?

अब कब बध होगा रावण का,कब दु:शासन हारेगा।
दूधमुँही बच्ची को कब तक बलात्कार कर मारेगा।।
कब तक आँखों पर, काली पट्टी का पहरा रखोगे।
कौन कुचाली कुकर्मीं आँखों को,नोंच निकारेगा।।

कितना हवस भरा है इन ,मालदार के सीनों में।
लज्जा की तो बात बेमानी, लगती कुटिल कमीनों में।।
अब डायपर पहनीं बच्ची भी,जब नहीं बच पायेगी।
कहाँ जाय अब बाप बिचारा,किसको कहाँ पुकारेगा।।

गली गली ,नुक्कड़ नुक्कड़ अब , सब तो डरा डरा सा है।
क्या?अब क्रूर कसाई होंगे , सचमुच सर्जक बहरा सा है।।
कब तक बिकता न्याय रहेगा,कब तक होगी हिटलरबाजी।
कब तक बिलखेंगीं बेटियाँ, लुटा लहू चित्कारेगा।।

कब तक बलि चढेंगीं बेटियाँ, आतातायी हाथों से।
किसे लगाये अब गुहार, जाकर किन किन नौनाथों से।।
घर,चौबारे,द्वार,बाजारे,ख़ुनी खेल बस जारी है।
जब गोद में बैठे लुटे लाडली, कौन फ़िर वस्त्र सम्हारेगा।।

पंडित अनिल

बाहर आओ

इतिहास बदलना है ? बदलना है तो दम दिखाओ।
केवल पानी से नहीं, पसीने से भी नहाओ।।

लिबास चमकदार है,क्या कहना जँचता है।
मगर कभी रूह में तो उतरो,रूह को चमकाओ।।

निशानियाँ यूँ हीं नहीं रहा करतीं ,मिट जाती हैं।
पाँव हल्के से नहीं,पाँव अंगदी अंगद सा जमाओ।।

उम्र तमाम तमाशा न रहे,दे दे ख़ुद्दारी ख़ुदाया।
तक़दीर तो साया है,कभी हौसला भी आजमाओ।।

खुद से ,खुदा से,जमाने से,है ये नाराज़ी कैसी।
निकलो,खेलो ,जरा घर से बाहर तो आओ।।

पंडित अनिल

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