मां मेरी बड़ी महान थी/नंद किशोर परिमल

मां मेरी बड़ी महान थी

मां मेरी बड़ी महान थी, सर्व गुणों की खान थी मां ।
सभी को समझाना काम था, राह पर सभी को लाती थी मां ।
बड़े बड़ों से वो बतियाती, कभी नहीं घबराती थी मां ।
गलत राह से बचना सिखाती, बच्चों को समझाती थी मां ।
मां मेरी बड़ी महान थी, सर्व गुणों की खान थी मां ।
पढ़ी मात्र तीन तक होगी, गीता -रामायण की पोथी हर दिन पढ़ती थी मां ।
कितनी कथा -कहानियों को हर दिन रटती रहती,
क्षण एक व्यर्थ गंवाती न थी ।
कर्म लक्ष्य मात्र रखती थी वो, कभी उस से वो भटकती न थी ।
अपना बेगाना न किसी को समझे, समरसता सब से रखती थी मां ।
बहू बेटी से न अंतर रखती, सभी को सीख अच्छी देती थी मां ।
मां मेरी बड़ी महान थी, सर्व गुणों की खान थी मां ।
खुद चाहे वो कम पढ़ी थी, संतानों को पढ़ाना लक्ष्य था उसका ।
बिन प्रशिक्षण बहु बेटी कोई न छोड़ी, रोजगार दिला कर सबको खुश होती थी मां ।
परिजन और बेगानों को भी, अपना बना कर रखो, बस यही सिखलाती थी मां ।
दान कर्म में न पीछे रहती, लखौलियां दर्जन भगवान् को चढ़ाती थी मां ।
बचपन से ही मेहनत और मशक्कत करना, बच्चों को समझाती थी मां ।
मां मेरी बड़ी महान थी, सर्व गुणों की खान थी मां ।
कभी कभार अशांत जब हो जाती, पिता जी प्यार से समझाते थे ऐसे ।
संतान तुम्हारी अच्छी बड़ी है, भाग्यवान कुछ धीरज रखो ।
ऊंचाई चढ़ाई तो जीवन में आती रहती हैं, कभी न तुम उनसे घबराना ।
औलाद है जिसकी सबसे अच्छी, वही है सबसे बड़ा खजाना ।
यही सीख सुन मां मेरी, हंस कर पिता जी से बतिया लेती थी ।
आखिर तक बच्चों ने भी, अपना फर्ज निभाया पूरा ।
मां के ही आदेश को सबने, सिर माथे अपने चढ़ाया ।
जो कहती मां थी, तत्काल वो होता, जैसा चाहती तब होता था ।
मां मेरी बड़ी महान थी, सर्व गुणों की खान थी मां ।
हाथ से करती काम वो रहती, जिव्हा से राम नाम थी रटती रहती ।
कभी काम से घृणा न करती, यही सभी को सिखलाती थी मां ।
बुरा किसी का कभी न करना, मूलमंत्र ये संतान को देती ।
सच्चाई को सदा जीवन में अपनाना, बुराई की ओर कभी मुंह न करना ।
थोड़े से ही संतोष कर लेना, हाथ न किसी के आगे कभी पिसारो ।
घर आए को खाली न लौटाना, थोड़े को बड़ा है कैसे करना ।
सब मंत्र यह सिखलाती थी मां ।
मां मेरी बड़ी महान थी, सर्व गुणों की खान थी मां ।
दोहते दोहतियों और पड़दोहतियों को, पोते -पोतुओं और पड़पोते,पड़पोतियों को भी ।
गले लगाकर रखती थी मां ।
हरदम उनको समझाती रहती, घर के नियम उन्हें बतलाती रहती ।
बच्चे सभी बीजी संग मजा थे करते, उन बिन क्षण भर रहते न थे ।
घर पहुंचते ही पहले उनके कमरे में थे जाते, मां के पैर छूकर अन्य से मिलने आते ।
कभी किसी से कड़वा मत बोलो, सदा सर्वदा सबको समझाती थी मां ।
मां मेरी बड़ी महान थी, सर्व गुणों की खान थी मां ।
आठ जून दो हज़ार अट्ठारह की रात ऐसी आ गई ।
सबसे वार्तालाप करके, मां आराम से थी सो गई ।
आधी रात साढ़े तीन बजे, लम्बी यात्रा पर मां थी अब चल पड़ी ।
पुत्र परिमल और बहु विनोद के हाथों, गंगा जल और तुलसीदल मां गटक कर ।
जी पी एस के परिजनों को अनाथ करके, प्रभु मिलन को मां थी निकल पड़ी ।
मां बतला दो किसे बताऊं, रो रो कर मैं किसे सुनाऊं ।
मां मेरी बड़ी महान थी, सर्व गुणों की खान थी मां ।।
नंदकिशोर परिमल, गांव व डा. गुलेर तह. देहरा
जिला, कांगड़ा (हि_प्र )पिन 176033
संपर्क, 9418187358

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