हाल-ए-दिल उनको सुनाना न आया
मोहब्बत निगाहों से बताना न आया

जब खुद को देखा मेरी निगाहों से
फिर खुद को ही छिपाना न आया

हम तेरे तार्रुफ़ से हुए कभी गाफिल
ऐसा कभी कोई भी ज़माना न आया

ये खुली ज़ुल्फ़ें और झुकी हुई नज़रें
क्यों फिर याद कोई फ़साना न आया

तेरे मरहमी लबों के सिवा हमें और
जहन में कोई ठौर-ठिकाना न आया

सलिल सरोज

नींद आती नहीं मुझे रात भर कोई तो वजह है
यकीनन कोई तो मुझमें रात भर जागता रहता है

मेरे ज़िंदादिल और हसीन होने का यही राज़ है
मेरी नसों में कोई तो खूं बनकर भागता रहता है

महफूज़ हूँ मैं बिलकुल जैसे कोई मोती सीप में
दुआ में रोज़ कोई मुझे खुदा से माँगता रहता है

खुदा का घर बसा तो भगवान् के अख्तियार से
मेरी ग़ज़ल में कोई तो नज़्म ये कहता रहता है

दावा है कि बुलंदियों तक पहुँचूँगा मैं एक दिन
अब भी कहीं कोई माँ के जैसे चाहता रहता है

सलिल सरोज

तुमको पा कर सब मैंने सब पा लिया
ज़मीं, आसमाँ , दो जहाँ को पा लिया

जग पूजता रहा गुमनाम फ़रिश्ते को
मैंने तुम्हें पूज कर खुदा को पा लिया

कोई सीखे मोहब्बत तो मुझसे सीखे
कि गीता पढ़ी तो कुरान को पा लिया

किसी बच्ची की इज़्ज़त बचाई तो लगा
कि अपने अंदर के इंसान को पा लिया

मिली है शोहरत उसी को इस जहाँ में
जिसने बावक्त अपने ईमान को पा लिया

सलिल सरोज