सहारा दीजिये

आइने में ज़िंदगी को खुद सँवारा कीजिये।
यूँ हीं लमहे ज़िंदगी के नँ गुज़ारा कीजिये।।

शाम होते ज़िंदगी की देर लगती है कहाँ।
क़ीमती हैं साँसें लहज़े से सम्हाला कीजिये।।

कश्मकश में तल्ख़ियोँ में ज़िंदगी खिलती नहीं।
कुछ तरन्नुम से इसे हरदम पुकारा कीजिये।।

कौन दे देता नहीं कांधा ज़नाजे को”अनिल”।
बंदगी हो जाये ज़िंदों को सहारा दीजिये।।

🌹पंडित अनिल🌹

नज़र लगी

गाँव गलियाँ शहर सब वीरान हैं।
खो गई है खनक जबसे पायलों की।।

मुस्कुराते होठ अब दिखते नहीं।
लग गई ऐसी नज़र है मनचलों की।।

प्यार के पंछी भी ग़ुम से हो गये।
हाल कहिये भी तो किससे दिलों की।।

ज़िंदगी फिसली किनारे पे अनिल।
कदर रख्खी ही नहीं कभी साहिलों की।।

बस्तियों में भी उदासी छा गई।
बच्चों को भी है फ़िकर अब मंज़िलों की।।

आदमी भी टूटने पल पल लगा।
फ़िकरमंदी थी नहीं यूँ मुश्किलों की।।

बरस जाये काश बादल फ़िर ख़ुशी।
दरक जाये नींव ही ग़म के किलों की।।

पंडित अनिल

पढ़िए काव्य महक की ये सुंदर रचनाएँ


ऑनलाइन पत्रिका भारत का खजाना के “काव्य महक” के दूसरे संस्करण में पढ़िये देश के जाने माने साहित्यकारों की मंत्रमुग्ध करने वाली रचनाएँ। जो आपको मिलेंगी सिर्फ और सिर्फ भारत का खजाना में।