जहाँ से अपनी रुसवाई बहुत है
में हूँ ओ गम -ए – तन्हाई बहुत है

नसीबा युँ है बिगड़ा ये मेरा भी
तमन्ने रुह घबराई बहुत है

बताऊँ खेल क्या किस्मत केअपनी
सुलगती शम्म की खाई बहुत है

बयां क्या करते दुखों का यहाँ पर
दिले सागर में गहराई बहुत है

गुजर ना जाऊं में हद से कहीं अब
जिगर पर चौट भी खाई बहुत है

चलूँ मैं कैसे अब मर्जी से अपनी
जमी दिल पर मेरे काई बहुत है

तराशा दर्द को चुभा के कांटे
मुहब्बत की , कि भरपाई बहुत है
( लक्ष्मण दावानी