हार-जीत/कुलभूषण व्यास

हार-जीत

तोड़ मुश्किल की दीवारें बज्र सा प्रहार कर।
बन सिकन्दर वक्त का न आंख अश्रुधार भर।।

एक बाजी गर जो हारी खेल जारी है अभी।
आगे बढ़ मैदान में न युद्ध से यूँ इनकार कर।।

जीत से अभिमान जिसको उसको हारा ही कहो।
लक्ष्य पे जिसकी नजर है वो है जीता हार कर।।

आगे बढ़ने के लिये सुन पीछे हटना भी जरूरी।
अपनी किस्मत खुद बना कोशिश हजारों बार कर।।

आसमां जो तूने पाया बढ़ चला यह गुमान क्यूँ।
टूट सकती है यह डाली इस पे न इतबार कर।।

जीत से नई मंजिले हैं हार से मिलता सबक।
हौसला भर फिर से दिल में हार से भी प्यार कर।।

राह में चलता मुसाफिर भूल जाए गम नहीं।
कामयाबी यूँ न आती भूल भी कई बार कर।।

स्वरचित
कुलभूषण व्यास
शिमला
9559360564

गमले में फूल

भवन के छज्जे में सलाखों के पीछे कतार में रखे गमलों में
सुंदर फूलों का जीवन

पिंजरे में बंद सुंदर पंछी के समान लगता है।
जो क्यारियों में बन्धुओं के बीच
मिल बैठ नहीं सकता
लताओं से खेल नहीं सकता
केवल उन्हें दूर से देख सकता है।

जमीन से जुड़ा नहीं
बनावटी जीवन जीता है
खून के आँसू प्रतिदिन पीता है।

बारिस की रिमझिम बूंदें
छूने को जिसका मन मचला
सप्तरँगों को अपने में सँजोये
पुष्प सुसज्जित गमला
अनायास ही स्मरण दिलाता है
उस कैदी अबोध पक्षि का
अपने स्वामी की कृपा पर ही निर्भर जो
अपना पूरा जीवन बिताता है।।

बरसात कितनी बरसी
गर्मी तपी या शांत रही
उसे ज्ञान नहीं।
पँखे से ताप का आभास नहीं
छत से बर्षा का एहसास नहीं।।

न काली घटायें बहलाती हैं
न हवाएं सन्देश लाती हैं।।

मन पक्षी का भी तो करता है
दूर नील गगन में विचरने को
दाना मिले न मिले
सहचरों संग कलरव करने को।

गमले के फूल को भी खाद पानी
समय पर भले ही मिलता है
परन्तु उसमें फूल
क्यारियों की तरह नहीं खिलता है।

उसे उन्नत मृदा से नहीं लगाव
स्वछंद जीवन से ही उसका अनुराग।

प्रेम प्रकृति के प्रति
मन उसके भी अथाह है
प्रकृति में ही जीने मरने की चाह है।

भले ही
फूल मूक बधिर होते
जुबान नहीं रखते
लेकिन पक्षी की भांति
सुख दुख रात दिन सर्दी गर्मी का अनुभव
मानव से कहीं कम नहीं करते।

ओरों की खुशी के लिए
जीवन का बलिदान देते हैं
काँटों से मैत्री कर उन्हें
हृदय में स्थान देते हैं।

पिंजरे का पँछी
भयातुर हो गा भी लेता है
गमले में लगा
फूल अनमना ही सही खिल भी लेता है।

उनकी इच्छा से कोई सरोकार नहीं
ज्यूँ पराधीन का कोई अधिकार नहीं ।।

सत्य तो यह है
उपवन में ही सुंदर लगती है फूल की मुस्कान
और
आसमान में ही भली लगती है पँछी की उड़ान।।

स्वरचित अप्रकाशित
कुलभूषण व्यास
शिमला।

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