डर लगे गुलदस्तों से/पंडित अनिल

डर लगे गुलदस्तों से उजाट राहों का अभी सिलसिला है। लोग कहते हैं मुक़द्दर में लिखा है।। यक़ीन है लौटेगी होंठों पर हँसी भी। साथ में दस्त-ए करम काफिला है।। धाम चारों घर में ज़िंदा हैं अभी मेरे। जो मिला इन फ़रिश्तों से मिला है।। फ़ासले यूँ ही नहीं रखता है कोई। फ़ासलों में भी … Continue reading डर लगे गुलदस्तों से/पंडित अनिल