डर लगे गुलदस्तों से/पंडित अनिल

डर लगे गुलदस्तों से

उजाट राहों का अभी सिलसिला है।
लोग कहते हैं मुक़द्दर में लिखा है।।

यक़ीन है लौटेगी होंठों पर हँसी भी।
साथ में दस्त-ए करम काफिला है।।

धाम चारों घर में ज़िंदा हैं अभी मेरे।
जो मिला इन फ़रिश्तों से मिला है।।

फ़ासले यूँ ही नहीं रखता है कोई।
फ़ासलों में भी ग़ुहर दर्दे सिला है।।

डर लगे अब गुलदस्तों से अनिल।
फन विषैला सा जैसे छुपा घुलाहै।।

पंडित अनिल

क्यों

?

कुछ लोग अपनी बेटी को अपना अभिमान बताते हैं।
दूसरे की बेटी को देख कर शैतान क्यों हो जाते हैं।।

बा-पर्दा रखना चाहें अपनी नन्हीं नन्हीं कलियाँ।
दूसरे की कलियाँ मये गुलशन क्यों उजाड़ जाते हैं।।

बेटियाँ अपनीं होती हैं जिगर अपनी अगर,फ़िर।
क्यों नहीं जहान की बेटियों पर तरस खाते हैं।।

ख़ौफ़ है ही नहीं क्यो उस दो जहान के मालिक से।
बना कर नर्क जहन्नुम अपना दिन ब दिन गिरे जाते हैं।।

ढोंग का आलम देखिये तो सही अब क्या कहना।
खुद को यहाँ खुदा और भगवान सब बताते हैं।।

कितने ही ख़्वाब सजते हैं कितने हैं टूटते बनते।
दहशतग़र्दी में लोग घरौंदा ही फूँक जाते हैं।।

पंडित अनिल

नींद से

मनुहार रात भर नींद का करते रहे।
इक़रार रात भर नींद का करते रहे।।

ख्वाब पलकों तक चले आये मगर।
इंतज़ार रात भर नींद का करते रहे।।

सिलवटें बिस्तर की सब हैं कह रहीं।
उपचार रात भर नींद का करते रहे।।

क्या पता किसको हमारे हाल का।
इज़हार रात भर नींद का करते रहे।।

कह सुनायेंगे किसे दिल-ए दास्ताँ।
दो-चार रात भर नींद का करते रहे।।

कट गई बेचैन शब-ए ग़म अनिल।
दीदार रात भर नींद का करते रहे।।

पंडित अनिल

हाथियों ने दिया महादेव को कुंजर महादेव का नाम/Ashish Behal


भटियात के मंदिर भाग 3 में आज श्रावण मास के पवित्र महीने प्रथम सोमवार पर ऑनलाइन ई पत्रिका भारत का खजाना में पढ़िए कुंजर महादेव की ये अद्भुत कथा। जय भोले नाथ।

लघुकथा अनुभव / विजयी भरत दीक्षित

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *