रूप चमका- चमका के यों ही/आलोक पांडेय

जीवन की धार समझ

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रूप चमका- चमका के यों ही
ज्यों मतंग मलंग घुमत ह्वै
फटी गुदरीया , लुटी डुगरिया
मनवा फिरंगी बन भनत चलत ह्वै ।
तन ऐंठे-ऐंठे से ऐसे , जाने क्यों देह अड़ाय खले !
गल- गलित नहीं बेढंग पकड़ , संस्कार भी तो हो अपनाए भले !
यौवन की सुधी ना तूझको, रसधार सुधा क्यों बहाय खले !
गलियों में घुमे – अवारे बन ,
संस्कारित हो , कुवृत्ति ढहाय भले !
समय नहीं पावत हो क्यों , दिन काट रहे ऐसो खनके ;
बीति विभावरी व्यथित क्यों व्याकुल,
कर से कर लेता गनित मनके !
दीन दीख रहे , चढाय नशा ,
कर न नाश अब शरीर कभी;
चंगा बन ,पंगु होता क्युँ ,
समय कहता अपने को समझाय अभी ।
पेयसी के चक्कर में क्यों संग- कुसंग पथिक भटके ,
हीन निःशेष घड़ी जीवन के,
निर्लिप्त बने सत्पथ अटके ।
दुःख भरी जीवन की कथा, संसार के सार आधार समझ;
सच है जगत् के निराधार स्तंभ , रहकर भी इससे पार समझ ।
जीवन की मधुर आस रहे ,
मंगल जीवन क्यों उदास पड़े ;
सबल बनें प्रतिक्षण यौवन के , सफल रहे ना परिहास अड़े ।
अब भूल नहीं करना नन्हें , अडिग रहना सदा कंटक – पथरीली सी राहों में ;
मानवता की यदि दिया नव बिहान ,
ग्रामवासिनी भारत माता ले लेगी बाहों में ।
यही संदेश है सार समझ, जीवन का प्रेम आधार समझ;
कंटक घातों का हर प्रतिकार कर, वीरता की धार समझ ।

– ✍ कवि आलोक पाण्डेय

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