है हँसी लब पे मगर इक/लक्ष्मण दावानी

है हँसी लब पे मगर इक दर्दे दिल गहरा तो है
लब पे पाबंदी नहीं अहसास पे पहरा तो है

हुए बा इज्जत रिहा वो कत्ल के इल्जाम से
दाग दमन पे नहीं , मन पर मगर ठहरा तो है

जिन के किस्मत में लिखे हो अंधेरे ही अंधेरे
बिजलियाँ उसपे गिरें या ना गिरें उजड़ा तो है

बस सदा कायम रहे रिश्ता मुहब्बत का तेरी
ज़िन्दगी में मेरे खूब सूरत तेरा चहरा तो है

हो रहे हो क्यूँ पशेमाँ बे वफाई से अपनी
अब मुहब्बत में तेरी जीवन गया सारा तो है

खींचती है रोज खुशबू जिस्म की तेरे हमें
हुस्न का तेरे हवा में रंग कुछ बिखरा तो है

अश्क के सैलाब में डूबे नहीं है हम मगर
आब-ए-जमजम मेरी आँखों मे ये खारा तो है

( लक्ष्मण दावानी ✍ )

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