आजकल बरक़त गुम सी/पंडित अनिल

बरक़त गुम है

आजकल बरक़त गुम सी है कमाई से।
लोग कहते हैं हम परेशान हैं महँगाई से।।

वो लोग रिश्तों की बारीकियाँ समझा गये।
जो खुद नहीं मिलते ईद त्योहार सगे भाई से।।

साथ रह कर भी आलम हो उदासी का ही।
कोई शिक़वा ही नहीं है मुझको तन्हाई से।।

हर तरफ़ ब्यापार है ग़म हो या के हों ख़ुशियाँ।
तोड़ लिया रिश्ता सबने अब अच्छाई से।।

बढ़ गयीं डिग्रियाँ दृरियाँ भी बढ़ गयीं दिल की।
अनपढ़ अच्छा था इस अंग्रेज़ी पढ़ाई से।।

पंडित अनिल
स्वरचित,मौलिक,अप्रकाशित
अहमदनगर,महाराष्ट्र
8968361211

है ज़िम्मेदारी

लचर होते कंधों पर अब बोझ भारी।
ज़िदगी से हार जाने की तईयारी।।

मुद्द-आ कुछ भी नहीं पर हैं परेशाँ यूँ।
नींद आयेगी कहाँ है ज़िम्मेदारी।।

फूल गुलशन में अभी मुस्काया नहीं।
तोड़ लेने की क्यों है ज़िद्द तुम्हारी।।

ज़िंदगी आसान होती है नहीं देख ले।
जीतता है वो जो हिम्मत न हारी।।

चीर कर तूफ़ान जो है पहली सफ़ में।
वोह उसकी आँखों मेंही है खुमारी।।

पंडित अनिल
स्वरचित,मौलिक,अप्रकाशित
अहमदनगर,महाराष्ट्र
8968361211

कटते गये

शजर-दर-शजर यूँ कटते गये।
साये से मरहूम हम बँटते गये।।

घोंसले परिंदे अब बनायें कहाँ।
शाख भी लटके हुवे छँटते गये।।

ज़ेब थोड़ा वक्त नें ढीले से किये।
रिश्ते हौले हौले खिसकते गये।।

बुलंदियों में जो सलाम देते रहे।
धुंध सा बादल सा वे हटते गये।।

काफ़िला बढ़ गया गैरों लेकिन।।
पास के हीरे वो सभी घटते गये।।

पंडित अनिल

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