अशोक दर्द की पहाड़ी कविताएं

पहाड़ी कविताएं

उडदी चिड़ी गेई गलाई

उडदी चिड़ी गेई गलाई |
चुन्जा चोग चुगा कर भाई ||

जे उडने दा शौक है तिज्जो |
रखेयां अपने फंग फैलाई ||

हौसले रखेयां दिले च अपने |
ताईं छुऊणा अम्बर जाई ||

नजरां गडाई केई बाज उड्डादे |
जीणा अपणा आप बचाई ||

सरहदां ढाहणा सिख पंछियाँ छा |
जीणा सच कर कंधाँ ढाई||

दिखी –सुणी ने अंगणा बौणा |
लोक बैठे ने जाल बिछाई ||

पथरां दे नी माहणु बणदे |
उम्र गवा मत चुरभुर लाई ||

मुठ दाणयां ने रजणा सिखील लै |
छड करणी तू काली कमाई ||

अपणा मानव धर्म निभा कर |
मंदर –मस्जिद आई –जाई ||

पैहले भेइडू पाला मितरो

पैहले भेइडू पाला मितरो |
फिरी सुक्खो नुआला मितरो ||

निम्ब्ली पिच्छ प्रगड़े पिय्या |
थां-थां घालामाला मितरो ||

खोटेयां सिक्केयाँ नी साहूकारी |
इनां ई मत संभाला मितरो ||

दिक्खी-सुणी ने रस्ते हंडा |
खरा नी वक्त दा चाला मितरो ||

बुरे कम्मे दा बुरा नतीजा|
जद तक होवै टाला मितरो ||

चंदरे दे पन्द्रह भोले दे सोलह |
मने दी मैल गुआला मितरो ||

जेब दिक्खी ने यारी पुगदी|
हसदे कडी दुआला मितरो ||

घुप्प न्याहरा बिखड़ा रस्ता |
कोई तां दीया बाला मितरो ||

जेकर तुसां बी गड्डणऐ झंडे |
कालियां भेडां ताला मितरो ||

घर उजाडू इनां नशेयाँ ई |
दीयो देशनिकाला मितरो ||

धीयां-भैणां दा मान बचाओ |
कुडियां चौंड-ज्वाला मितरो ||

अशोक दर्द

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