त्याग के तुम घर-बार फिर/सलिल सरोज

त्याग के तुम घर-बार फिर मिलना मुझे

तुम्हारी गली में जो आऊँ भरी धूप में मैं
चूड़ी,कंगन सब छोड़-छाड़ मिलना मुझे

ये ज़माने की उलझनें,ये रश्मों की दीवार
आज बस सब तोड़-ताड़ तुम मिलना मुझे

अँगिया के धागे भी न बाँधे हो तो ना सही
जगत के भूल के लोक-लाज मिलना मुझे

बाबा का डर न अम्मा की कोई फटकार
त्याग के तुम घर-बार फिर मिलना मुझे

दुनिया की तमाम दौलत और शोहरत को
आखिरी बार जीत-हार के तुम मिलना मुझे

सलिल सरोज

तुम आज जो माँग लो मुझसे,मैं वो सब दूँ

नाचूँ आज इस कदर कि मैं खुद को खो दूँ
अपने जिस्म के हर अंग में मस्तियाँ बो दूँ

भुला के संसार के हर रीत और रिवाज़ को
ज़ोर से चीखूँ,चिलाऊँ,हँसूँ और फिर रो दूँ

बारिश की बूँदों को अपनी ज़ुल्फ़ों से बाँधूँ
उसी खुशबू को वापस माँगूँ मैं उन्हें जो दूँ

फीका पड़ा है नींद से जागा हुआ आसमाँ
अपनी धानी चुनर के चटख रंगों से धो दूँ

खुशियों को बाँहों में भींचके होंठों से पी लूँ
तुम आज जो माँग लो मुझसे,मैं वो सब दूँ

सलिल सरोज

नींद के धागों से ख्वाब कोई सिलता तो है

मशहूर हो कर भी क्या किया जहॉं में
वो बदनाम ही सही सबसे मिलता तो है

बात जूनून की है जीवित रहने के लिए
कीचड में ही सही कँवल खिलता तो है

गैर-अकड़ मुर्दा होने ही की पहचान है
हवा चलने पर ज़िंदा इंसां हिलता तो है

ग़ुरबत कब जीत पाई है किसी हौसले को
नींद के धागों से ख्वाब कोई सिलता तो है

सलिल सरोज

अपने दिलों में खुदा का भी इक मकाँ रखना

बदलती दुनिया में कुछ इस तरह बसर रखना
दुश्मनों से भी गले मिल सको ऐसा हुनर रखना

जहाँ भी जाओ इज़्ज़त की चादर तन पर रखना
अपनी निगाहों में अदब , बातों में असर रखना

चहचहाती चिड़ियों की नस्ल पर नज़र रखना
ये ख़त्म ना हो जाएँ , घर में हरी शज़र रखना

बच्चियों की आदतों में ना कोई कसर रखना
वो ज़ुल्म पे चिल्ला सकें, तेवर में गजर रखना

गर हो इंसान तो साफ़ अपना ईमान रखना
अपने दिलों में खुदा का भी इक मकाँ रखना

सलिल सरोज

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