एक मसीहा पाला है/अशोक दर्द

एक मसीहा पाला है

हमने अपने अंतर्मन में एक मसीहा पाला है |
जब-जब हद से दर्द बढ़ा तो उसने हमें सम्भाला है ||

कठिन राह में जब-जब भी अंधेरों ने हुंकार भरी |
आकर तब खुद उसने हमको बांटा खूब उजाला है ||

दुनिया के हैं रंग दोगले उसने यह समझाया है |
बाहर है जो जितना उजला अंदर उतना काला है ||

अपनी सारी चिंताओं को उसको सौंप के देखा तो |
उसने ही फिर प्यास बुझाई उसने दिया निवाला है ||

जब-जब भ्रमित हुए तो उसने आकर कान में दोहराया |
मस्जिद भी है तेरे भीतर , भीतर तेरे शिवाला है ||

अपनी कश्ती लगी डूबने जाकर जब मंझधारों में |
तब-तब मांझी बन कर उसने भंवर से हमें निकाला है ||

बधिक जमाने वालों ने जाल में हमें फंसाया तो |
उसने ही तरकीब बताई काटा उसी ने जाला है ||

राह कंटीली से विचलित हो विश्वास हमारा डोला तो |
तब-तब बंद मुकद्दर का उसने खोला ताला है ||

जीवन जीने का उसने ही मन्त्र दर्द सिखाया है |
कदम – कदम पे चमत्कार का करतब देखा भाला है ||

अशोक दर्द
चम्बा

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