मुहब्बत की जुबां /ग़ज़ल/आज़म सावन खान

ग़ज़ल

मुहब्बत की जुबां से वो कभी मीठा नहीं था
मुझे तो वो कभी भी प्यार से मिलता नहीं था

बिछड़ जाने का उससे क्यों मनायें ग़म भला हम
हमारा पहले भी उससे कोई रिश्ता नहीं था

पराया ही रहा हूँ मैं सदा उनकी नज़र में
सितमगर ने कभी अपना मुझे समझा नहीं था

नज़र आता नहीं है वो कहाँ गुम हो गया है
किसी ने भी यहाँ उस शख्स को देखा नहीं था

निभाता फ़िर भला कैसे वफ़ा की बात कोई
किया मुझसे उसे जब याद ही वादा नहीं था

मुहब्बत की मिलाकर के निगाहें यूँ किसी से
लगेगी चोट दिल पर ये कभी सोचा नहीं था

निभाता ही रहा हूँ दोस्ती को मैं ही तन्हा
किसी ने तो कभी अपना मुझे समझा नहीं था

बताता तो किसे हाले जिगर अपना यहाँ जो
यहाँ तो पास में आज़म कोई चहरा नहीं था

आज़म सावन खान

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