—— *बरसे बादल*

उमड़ घुमड़ कर बादल आये
तृषित पिपासित मन हर्षाये।
अमृत कण से जल बरसाने
नभ पर श्यामल जलधर छाए।।

चतुर्दिशा से उठे मेघ से
गमनशील हैं त्वरित बेग से।
गरजो हृदय कम्पित न हो
बरसो धरणी सिंचित कर दो।।

प्रकृति का यह प्रबंध है प्यारा
सृष्टी का अनुबंध यह न्यारा।
चढ़े ताप और बढ़े निराशा
वारिद शान्त करें हैं पिपासा।।

नदियों का यौवन जब सूना
जलधर करदें पुनः सौगुना।
नव आवरण हो हरियाली का
कोंपल फूटें हर डाली का।।

मुरझाये चेहरे मुस्काये
मन में शीतल भाव जगाएं।
मधुरिम वातावरण हो चला
स्वच्छ सा पर्यावरण हो चला।।

माटी से उठती गन्ध प्यारी
सुमन सुगन्धित पे भी भारी।
दृश्य सुरम्य रसमय है अब
कृषक समाज न चिंतित है अब।।

तृण पादप भी परम् तुष्ट हैं
मिटी पिपासा सब सन्तुष्ट हैं।
मेघों ने अमृत बरसाया
मृतप्राय ने जीवन पाया।।

अति जलभार को भीतर रखते
पुण्य धरा को सिंचित करते।
दीन दलित के दुःख निवारक
नमन सर्वदा हे प्रजापालक।।

मौलिक रचना
कुलभूषण व्यास
शिमला 9459360564