नन्हीं बिटिया

नन्हीं बिटिया बचपन में क्या सपन सजाती है।
उसे पता क्या कली कुसुम कुँचली जाती है।।
कभी परी कभी कपड़े की गुड़िया से खेले।
नींच चील सी आँखें इसे पचा नहीं पाती है।।

बहुत ब्यथित है मन क्या हवाँयें ज़हर हो गयीं।
क्या पुरुषों के मन की ममता मर कर सो गयी।।
नोंच नोंच कर क्यों दरींदगी हमें खा जाती है।
नींच चील • • • • • • •

घर में नन्हीं बेटी या के सयानी सी पलती है।
सड़क चले बच्ची तो क्यों कसक चलती है।।
भींड़ कैसे तमाशबीन सी बन जाती है।
नींच चील • • • • • • •

दुःशासन बन कहते मेरा देश महान है।
हैवानों का कैसा धर्म दीन कैसा ईमान है।।
क्रूर आँख निज बेटी से कैसे मिल पाती है।
नींच चील • • • • •

काँप कलेजा उठता है बच्ची बन कर आने में।
कोख धरा दुश्मन सब मेरे लगे नोंच खाने में।।
क्रूर कसाई कपट से आत्मा अब घबराती है।
नींच चील • • • • • •

पंडित अनिल

हाँ मैं पिता हूँ

हाँ मैं पिता हूँ
बेटी का पिता हूँ
बेटे का पिता हूँ

बेटी और बेटे का
अंतर
बिल्कुल होता है

दोनों हो ही नहीं
सक्ते कभी भी
समानांतर

दोनों हृदयवान
दोनों की अलग
पहचान
दोनों की अलग धुन
दोनों की अलग अपनीं
उड़ान

कभी धूप कभी छाँव
कभी शहर कभी गाँव
मैं
उनके सपने सजाने को
भोर निकलता कमाने को
मैं
बच्चों का अटूट रिश्ता हूँ
हाँ मै पिता हूँ

पंडित अनिल
स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित
अहमदनगर, महाराष्ट्र
8968361211

हरि शरणम्

दिल का शोर जब थम जाये,
दुनिया जब ये – – – ठुकराये।
हरि शरण तब – – -आ जाना,
प्रभु चरण तब – – -आ जाना।।

अपना जब ये आँख दिखाये,
बात तीर सी जब चुभ जाये।
कोई राह नजर ना- – – आये,
हरि – – – – – – – – – – – – – – –

यौवन के दिन ढल जायेंगें,
पुर्जे-पुर्जे हिल —-जायेंगे।
गठरी जब ना – -चल पाये,
करम बही जब खुल जाये।।हरि- –

सूरज चाँद सितारे डूबे ,
पहुँचे बहुत किनारे डूबे।
नयन भरम जब हट जाये,
मन अँधियारा छँट -जाये।।हरि- –

एक सहारा – – -रख लेना ,
फ़ुर्सत हो जब- -चख लेना।
नाम दीप जब – -जल जाये,
हृदय कमल जब खिल जाये।।

हरि शरण तब – –आ जाना।
प्रभु शरण तब- – – – – – -।।

पंडित अनिल
अहमदनगर महाराष्ट्र

पढ़िए काव्य महक की ये सुंदर रचनाएँ


ऑनलाइन पत्रिका भारत का खजाना के “काव्य महक” के दूसरे संस्करण में पढ़िये देश के जाने माने साहित्यकारों की मंत्रमुग्ध करने वाली रचनाएँ। जो आपको मिलेंगी सिर्फ और सिर्फ भारत का खजाना में।

देख ले भगवान

देख ले भगवान ये क्या हो रहा है।
क्यों बना पत्थर सा मालिक सो रहा है।।

घुट रहा दम निर्दयी दुनिया में तेरी।
क्या जरूरत है नहीं दुनिया को मेरी।।
मासूम हूँ बच्ची हूँ दिल बेबस रो रहा है।
क्यों बना • • • • • •

क्या तेरे संसार में मैं नुँचती रहूंगी।
वेदना दुष्कर्म सब सहती रहुंगी।।
नारी का सम्मान क्यों यूँ खो रहा है।
क्यों बना • • • • • •

जी रहे निर्लज्ज दानव क्यों जमीं पर।
पी रहे सब रक्त अबोधों का जमीं पर।।
पुरूष नफ़रत नारी हृदय क्यों बो रहा है।
क्यों बना • • • • • • • •

है निर्दयी निर्मम निरंकुश आदमी।
इसांनियत का गला घोंटे आदमी।।
नर निशाचर नराधमी क्यों हो रहा है।
क्यों बना • • • • • • •

पंडित अनिल

भारत माँ की बेटी हूँ/आशीष बहल

पानी के लिए वलिदान हुई थी रानी सुनयना/कैलाश मन्हास