पहाड़ी कविता/ठाकुर विशाल सिंह

खेत्राँ च मेहनत नी करनी,,
फसलाँ च पाई देणी दवा,,
बर्गर पिज्जे खाँणें रोज़,,
अक्ल औंणी सव्हा,,

चाचे जो अंकल गलांणां
आँटी होई गई बुआ,,
मैल पांणां यूरीया,,
मूश्क मारे गोआ,,,

कुछ खांदे थे चिड़ियाँ-तोते,,
कुछ खांदा था चुआ,,
मांणु खाई ले शराबा,,
परिवाराँ जो खाई लेंदा जुआ,,

जैविक खाद दा उपयोग करो,
मैल नी पाणाँ दुआ,,,
“विशाल” तु मांणु बणी जा,,
नि ताँ मरी मुकी जाणाँ मुआ,,

ठाकुर विशाल सिंह
7018715504
(स्वरचित)

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