पंडित अनिल जी की सुंदर रचनाएँ

वाह जीवन

मन छलनी छलनी हो जाये,कटु वचन बाँण सा वार करे।
कैसे कोई असहाय बना फ़िर इस जीवन से प्यार करे।।
बैरागी सा नीरस मन उचटा सा क्या श्रृंगार करे।
कैसे कोई असहाय • • •

बिबिध ब्याधियों से घिर काया जब घबराये।
कुछ अपने भी मौका देख दूर हों अलगाये।।
मौका परस्त अपना ही जब लाचार करे।
कैसे कोई • • • •

खलता बेरंगी दुनिया को अल्हड़पन या दीवानापन।
इक भ्रम फैलाये लोग गले मिलते दिखलाते अपनापन।।
क्या क्या ग़म कोई गुम कर ले क्या क्या कोई इजहार करे।
कैसे कोई • • • • •

फसलें मुरझा जब गिर जायें पागल मेघों का आना क्या।
जब प्राणहीन हो जाये तन अमृत बूँदे बरसाना क्या।।
श्रवण नेत्र जब शून्य हुवे तब प्रभु ही बेड़ा पार करे।
कैसे कोई • • •

पंडित अनिल

अहमदनगर,महाराष्ट्र
8968361211

बताओ तो जरा

झूमकर बरसेगा बादल मुस्कुराओ तो जरा।
घटा छायेगी छत पे ज़ुल्फ़ लहराओ तो जरा।।

आइना शर्म से हो जायेगा खुद ही चाक चाक।
चिल्मन ये रुख़सार से हटाओ तो जरा।।

हम दीवानें हटके हैं जमाने से बहुत अलग।
फ़ुर्सत हो कभी हमें आजमाओ तो जरा।।

मासूम हम हुनर नहीं चुपके से दिल चुराने का।
ये हुनर कहाँ से सीखा हमे बताओ तो जरा।।

लोग कहते हैं खुद को खरा हैं दूसरे खोट।
कभी खुद पे ये इल्ज़ाम लगाओ तो जरा।।

पंडित अनिल

घर मेरे

किसके नसीब से बरक़त है घर मेरे।
किसके कदम तले जन्नत है घर मेरे।।

श्याह घुप्प अँधेरा मैं क्या नहीं रहा।
रोशन चराग़ किस बदौलत है घर मेरे।।

रिज़्क घर आता मेरे किसके नसीब से।
किसके करम से शोहरत है घर मेरे।।

क़ाबिल रहा नहीं किसी काम का कभी।
पर किसी की नेंमत रहमत है घर मेरे।।

भगवान है खुदा है सब हैं जमीन पर।
माँ बाप यक़ीनन किस्मत हैं घर मेरे।।

महफ़ूज हूँ दुआओं का साया है इनका।
कह दो अनिल यही तो हैं जिगर मेरे।।

पंडित अनिल

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