नन्ही चिड़िया/पंडित अनिल

नन्हीं चिड़िया

दाना खाने गाना गाने आती है ये चिड़िया।
चूँ चूँ करती सबके मन को भाती है ये चिड़िया।।
जागो बच्चों हुआ सबेरा सिखलाती है चिड़िया।
चूँ चूँ करती सबके मन को भाती है ये चिड़िया।।

आहट पाते पाँवों की ये देखो फुर्र हो जाती है।
रंगीले पंखों से देखो आसमान चढ़ जाती है।।
तिनका तिनका लिये घोंसला खूब सजाती चिड़िया।
चूँ चूँ करती सबके मन को भाती है चिड़िया।।

नन्ही नन्ही चिड़ियों ने भी ग़ज़ब हौसला पाया है।
नन्हे पंख से आसमान को देखो नाप दिखाया है।।
जल्दी हाथ नहीं किसी के आती है ये चिड़िया।
चूँ चूँ करती सबके मन को भाती है ये चिड़िया।।

तुम भी बच्चों भोर में जागो तब उड़ान भर पाओगे।
नहीं तो सोये सोये मोटे आलसी कहलाओगे।।
दौड़ो भागो छटा बिखेरो है बतलाती चिड़िया।
चूँ चूँ करती सबके मन को भाती है चिड़िया।।

पंडित अनिल
स्वरचित,मौलिक,अप्रकाशित
अहमदनगर,महाराष्ट्र
8968361211

किसका असर है

काँपते हाथ लरजते आँसू ये हसर है।
परवरिश में ज़रूर कुछ तो कसर है।।

बेढंगे पहनावे बेअदब बोलियाँ तीखी।
नौजवानों तुम पर किसका असर है।।

कोलाहल चींख बे आबरूपन हाय।
क्या यही हमारा प्यारा वो घर है।।

न मंज़िल न इल्म की चाहत ही कोई।
प्यारों ये तुम्हारी कौन सी डगर है।।

नफ़रत है रग़ों में क्यों अनिल देखो।
चारसू आग है धुआँ है क्यूँ शरर है।।

पंडित अनिल

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