पिता दिवस विशेष

पिता हमारे परम पूज्य हैं,
देव-तुल्य नहीं स्वयं देव हैं।
भावों की अद्भुत सृष्टि हैं वे,
सत्य सनातन दिव्यदृष्टि हैं।१।

है उनसे ही पहचान हमारी,
सृष्टि नहीं उनके बिन प्यारी।
पुण्य प्रसाद उन्हीं का है जो,
कीर्ति सुयश हर ओर हमारी।२।

वे घनी धूप में छाँव बने हैं,
सम्बल बनकर साथ खड़े हैं।
मेरे जीवन में आने वाली,
समस्याओं से स्वयं लड़े हैं।३।

धर्म कर्म युत होकर निसि दिन,
पुण्य-महा-अर्जित कर प्रतिदिन।
वेद-पाठ नित्य मंत्रोच्चारण से,
सुन्दर भविष्य सृजते प्रति दिन।४।

हमारी इच्छाएँ वे पूर्ण करते हैं।
हर्षित होने से हमारे हर्षाते हैं।
स्वयं का दुःख हमसे नहीं कहते,
गम की छाया नहीं पड़ने देते हैं।५।

बोध हुआ मैं पिता बना जब,
पिता होने का है क्या मतलब।
सब कुछ त्याग के खुश रहना,
देखा संतति को खुश जब जब।६।

प्यार दुलार का अर्थ समझ अब
डाँट फटकार की चाहत है अब।
काश वही दिन फिर लौट आते,
बचपन के जो दिन बीत गए अब।७।

हे प्रभु! उनकी सेवा में मुझसे,
कहीं कोई त्रुटि ना हो भूल से।
क्षमा मिले उनसे हरपल हमें,
आशीष हस्त सदा रहे स्नेह से।८।
——-बृजेश पाण्डेय ‘बृजकिशोर’