तेरी हर रजा मंज़ूर है/पंडित अनिल

मेरे साँईं

तेरी हर रजा मंज़ूर है।
तूँ तो जगत का नूर है।।
हम हैं कलुष से भरे हुवे।
तभी साँईंयाँ लगे दूर है।।

तूँनें जल से दीप जला दिया।
अपना रहम बरसा दिया।।
जिस भाव से जो आ गया।
वही रूप तेरा हुज़ूर है।।

शिरडी को धाम बना दिया।
भगतों को सब कुछ है दिया।।
जो न पा सका तेरा दरस।
उसकी नज़र का कुसूर है।।

तेरे दर पे हर मन्नत मिले।
क़दमों में तले जन्नत मिले।।
मेरे साईयाँ तेरे दर अनिल।
झोली भरी भरपूर है।।

पंडित अनिल

नाम की मस्ती “

सवँर जायेगी ,जब नाम की मस्ती होगी।
सोच ले , ज़िंदगी की क्या हस्ती होगी।।

जागीरें खींचती हैं, दुनिया की लेकिन ।
नाम में मिटना भी, नामपरस्ती होगी ।।

डूब नहीं शक्ती ,सौंप दें उसे अगर ।
हाथ जब उसके , अपनीं कश्ती होगी ।।

क़ीमती बहुत है , अगर ये मिल जाये ।
हर चीज़ दुनिया की,फ़िर सस्ती होगी।।

मुफ़लिसी की बातें, अजी छोड़िये भी ।
लीजिये फ़िर देखिये,क्या बस्ती होगी।।

पं अनिल

अहमदनगर महाराष्ट्र

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