मैं जब मिलता हूँ/सलिल सरोज

मैं जब मिलता हूँ तो आदतन मुस्कुरा देता हूँ
कुछ उनकी सुनता हूँ,कुछ अपनी सुना देता हूँ ।।1।।

वो बच्ची है अभी,कैसे सब कुछ कह पाएगी
मैं अपनी कविताओं में उन्हें बुलंद ज़ुबाँ देता हूँ ।।2।।

वो हमसफर है मेरी,मेरे साथ ही चलना है उसे
अच्छी बताके,बुराई को निगाहों में छुपा देता हूँ ।।3।।

चेहरा ढँका हो नूर कहाँ नज़र आएगा फिर
रफ्ता-रफ्ता अब मैं ही पर्दा हटा देता हूँ ।।4।।

ये इश्क़ है बहुत इम्तहां लेके ही आएगा
जो नौसिखिए है बारहां उन्हें बता देता हूँ ।।5।।

मुझे नौकरी से कभी फुर्सत मिली ही नहीं
अच्छा हूँ, माँ जब भी पूछे तो सुना देता हूँ ।।6।।

सलिल सरोज

चमन गुलज़ार नज़र आता है
फिर आँखों में धुआँ क्या है

क़त्ल हुआ है सब खामोश हैं
इस शहर को हुआ क्या है

मंदिर में बच्ची कुचली गई है
खुदा के लब पे दुआ क्या है

खुद ही कहीं नज़र में नहीं हैं
फिर आँखों से छुआ क्या है

घर-बार सब तो हार बैठे हैं
मुफ़लिसी में ये जुआ क्या है

सलिल सरोज

वो जितना सुना ज़माने की सुना
दफ़अतन मेरा ही सुनाना रह गया

वो दास्ताने-इश्क़ सबको बताता रहा
पर जिसको था उसी को बताना रह गया

सारी महफ़िल न जाने क्या कहता रहा
जो अफसाना था वही कहना रह गया

खुद को तो जला ही चुके हो बेख़ुदी में
इस बेदिली में मुझे ही जलाना रह गया

ये तेरी संगदिली की इन्तहां ही है
क्या मुझे भुलाने का कोई और बहाना रह गया

सलिल सरोज

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