हे मेरे राम /पंडित अनिल

हे मेरे राम राया

कब समेट ले चादर अपनी,ये काया।
तुम बिन जाने कौन हे मेरे राम राया।।

ओस की बूँदों मेंतूँ ,घास में दूबों में तूँ ।
उम्मीद नाउम्मीद,सबके मंसूबों में तूँ।।
अंकुरों में समाया, हे मेरे• • •
हे मेरे राम • • • • • •

चट्टान में तूँ हीं तो है,तूँ हीं पत्थरों में।
लौह में तूँ हीं तो है,तूँ हीं नश्तरों में।
रूप कँड़ कँड़ में दिखाया, हे मेरे राम
हे मेरे राम • • • • • • • •

तुम्हारे इख़्तियारी,में है दरिया समंदर।
जलालत दे या के, बना दे सिकंदर।।
भेद तेरा किसने है पाया, हे मेरे राम • •
हे मेरे राम • • • •

तूने लिख दी है तो टाले, कौन जग में।
बाँध कर घुँघरू,नचाता है तूँ पग में।।
क्या जहाँअंबर सजाया, हे मेरे राम • •
हे मेरे • • • •

पंडित अनिल

रिश्ता-ए-दर्द

दर्द मेरा हर ठिकाना जनता है।
मुझसे वो रिश्ता पुराना मानता है।।
कह रहा कानों में कोई सुन जरा।
बाद काली रात के ही बिहानता है।।

मैं चलूँ धूप या के छाँव में।
मैं रहूँ शहर या के गाँव में।।
पाँव घुँघरू आँके झटपट बान्हता है।
मुझसे वो रिश्ता • • • •

ख़ुशी पल में दे भर देता नयन।
वही जाने कैसे है करता चयन।।
ज़िद्द ना जाने वो कैसी ठानता है।
मुझसे वो रिश्ता • • • •

दे दिया किरदार जो निभाये चलूँ।
कुछ बयाँ तो कुछ छिपाये चलूँ।।
है करीबी भले से पहचानता है।
मुझसे वो रिश्ता • • • •

दिन हो या के रात हो या हो सपन।
हर घड़ी दिखलाये रहता है दरपन।।
भींड़ है फ़िर भी अनिल वीरानता है।
मुझसे वो रिश्ता • • • •

पंडित अनिल

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