पढ़िये सलिल सरोज की कविताएं

न जाने मैं अब्र से ये क्या चाहता हूँ कि
प्यास को शोलों से बुझाना चाहता हूँ
गर कोई हद होती है इस जुनूँ की तो
बेख़ौफ़ मैं वो हद, बेहद देखना चाहता हूँ
वो फ़ितना इक हर्फ़ है शाइस्तगी का
कमबख़्त मैं उसे स्याही में डुबोना चाहता हूँ
वो चाँद सा हमसफर है इन स्याह रातों का
और मैं उसे हथेली पे उगाना चाहता हूँ
वो चमक रहा है फलक पे रोशनी की तरह
मैं उसे कमीज़ में बटन की तरह टाँकना चाहता हूँ
वो मिशाल है कश्मीर की मोहब्बत सा खुदाया
मैं उसे हिन्दोस्तान-पाकिस्तान में बाँटना चाहता हूँ
वो नई-नवेली तासीर है मसीहाई की
मैं उसे मज़हबी रंगों में फेटना चाहता हूँ
वो ख़ुशबू है इस मिल्कियत-ए-चमन का
मैं बारहाँ उसे बाँहों में समेटना चाहता हूँ
उसका रूप है कि सूरज का धूप है
मैं बेक्रां उसे अलाव की तरह लपेटना चाहता हूँ

सलिल सरोज

मुझसे दुश्मनी भी की तो वो मशहूर हो गया
मैं मेरी शख्सियत पे आज फिर मगरूर हो गया।।1।।

मेरी ही ग़ज़ल गाके वो महफ़िल का नूर हो गया
मेरी मौशिकी को आदतन फिर गुरूर हो गया।।2।।

उन्हें लगा शाकी की मदहोशी में झूमते रहते हैं
बताए कि मैखाने को हमारे शबाब का शुरूर हो गया।।3।।

कीमतें आज बाज़ार में आपकी बुलन्दियों पे हैं
जिसने छुआ मेरी तासीर को वो हूर हो गया।।4।।

जब तलक़ रहे दुआओं में फलक पे ही रहे
जो गिरा इन निगाहों से शीशे की तरह चूर हो गया।।5।।

सलिल सरोज

शब्द
अगर इतने ही
समझदार होते
तो खुद ही
गीत,कविता,
कहानी,नज़्म,
संस्मरण या यात्रा-वृतांत
बन जाते

शब्द
बच्चों की तरह
नासमझ और मासूम
होते हैं
जिन्हें भावों में
पिरोना पड़ता है
आहसासों में
संजोना पड़ता है
एक अक्षर
के हर-फेर से
पूरी रचना को आँख
भिगोना पड़ता है

जैसी कल्पना मिलती है
शब्द,बच्चे की भाँति
वैसा रूप ले लेता है
जैसी भावना खिलती है
वैसा धूप ले लेता है

शब्द और बच्चे
एक से ही हैं
श्रेष्ठ कृति के लिए
दोनों को
पालना पड़ता है
समय निकाल के
संभालना पड़ता है
तब जाके
एक अदद इंसान
की तरह
एक मुकम्मल
रचना तैयार होती है।

सलिल सरोज

तुम मुझे मेरी नींद में मिलना,

मैं वहाँ हज़ारों ख्वाब बेचता हूँ,

मेरे साथ-साथ ही फिर चलना,

हँसी-मुस्कुराहटों के बाग सीचता हूँ,

खुशबू की तरह से फ़िज़ा में घुलना,

मैं हाथों से अपनी दोनों आँखें मीचता हूँ।

ओंस के कपड़े को जब तुम बदलना,

मैं भाप की लंबी सी चादर खीचता हूँ।

दुधिया रोशनी में बेइंतहा पुरजोर खिलना,

मैं शर्म से अपने होंठों को भींचता हूँ।

चोरी-चोरी ही सही तुम ख्वाहिशों में चलना,

मैं जादूगर हूँ,रूमानियत की दुनिया रचता हूँ।

सलिल सरोज

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