मैं ग़ुलाम हूँ/सलिल सरोज

मैं ग़ुलाम हूँ
मेरी ही शर्तों का
जो मैंने कर दिए थे
फिसलती ज़ुबाँ से
जिसकी सतह पर
आज तक भी
सच की नींव
नहीं टिक पाई है


अब ये ग़ुलामी
मुझपर
इस कदर हावी है
कि
मेरे वजूद का खोना
तो लगता
अवश्यम्भावी है

क्यों
अपनी ही नियति के
हम ग़ुलाम हो जाते हैं
आदर्शों के मापदंड
सब तमाम हो जाते हैं
अनमने से बुत्त बने रहना
रोज़ाना के बस
काम हो जाते हैं

हमारी लालसा
हमारी महत्वाकांक्षा
क्योँ
हमारी ज़िन्दगी से भी
बड़ी हो जाती है
जिसे हासिल करने
की चाहत में
सब रिश्ते,घर-बार
मुर्दा सी हो जाती है

क्या प्रयोजन है
ऐसे शर्तों का
कि
मैं हर क्षण
ऐसे बंधन में हूँ
जिसका कोई
मूल्यांकन नहीं
जिसका कोई
सत्यापन नहीं
बस
समाज की परिपाटी पर
टिकने के लिए
एक नीति है
एक प्रणीति है
जिसकी धुरी पर
मैं ही
पिसता रहता हूँ
रोज़ नासूड़ की तरह
थोड़ा थोड़ा
रिसता रहता हूँ

गर ये शर्त
खत्म हो गए
तो क्या हम भी
खत्म हो जाएँगे
शायद नहीं
क्योंकि
ज़िन्दगी
केवल ही शर्त नहीं
वरन सम्मान भी है

सलिल सरोज

ज़िन्दगी इस कदर भागती रही कि
रोटी कहीं तो भूख कहीं रह गई।।1।
माँ नहीं रही जब से मेरे इस घर में
छत कहीं तो दीवार कहीं रह गई।।2।।
हम अपनी ही नज़रों में गुनहगार हैं
हँसी कहीं तो तहज़ीब कहीं रह गई।।3।।
हमने बच्चियाँ पाली हैं इस शऊर से कि
बेटी कहीं तो शरारत कहीं रह गई।।4।।
हमें शौक सा हो गया है ज़ुल्म ढाने का
अदाबत कहीं तो मोहब्बत कहीं रह गई।।5।।
सब कुछ पाने की चाह हुई ऐसी कि
धूप कहीं तो छाँव कहीं रह गई।।6।।
हम इंसान भी तो न बने रह सके
भजन कहीं तो अज़ान कहीं रह गई।।7।।
ऐसे जी कर भी क्या जिया हमने कि
लफ्ज़ कहीं तो ज़ुबान कहीं रह गई।।8।।

सलिल सरोज

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *